महिला ने जेवर बेचकर स्कूल को दिए 6 लाख रुपए:बोलीं-मैं बूढ़ी हो गई, अब क्या गहने पहनूंगी; सरकारी पेंशन से चलता है गुजारा

मैं तो बूढी हो चुकी हूं। अब क्या गहने पहनूंगी। मेरे गांव में स्कूल नहीं था। मैं पढाई नहीं कर पाई। गांव के स्कूल में अगर अच्छे कमरे बनेंगे तो बच्चे पढ़ सकेंगे। करौली जिले के टोडाभीम से 40 किलोमीटर दूर गांव सिंघानिया की रहने वाली रामप्यारी (85) ने अपने गहने बेचकर गांव के राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल में 6 लाख रुपए की लागत से एक कमरा निर्माण करवाने की घोषणा की। रामप्यारी पिछले 50 साल से अपने पीहर में रह रहीं हैं। जहां सरकार से मिलने वाली पेंशन से उनका गुजारा चलता है। वहीं पूरा परिवार खेती पर निर्भर हैं। बुजुर्ग महिला की ये पहल पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई। गणतंत्र दिवस पर परिवार ने समाज के पंच पटेलों को पैसे सौंप दिए। इसके बाद कमेटी बनाकर स्कूल में कमरों का निर्माण किया जाएगा। रामप्यारी ने गणतंत्र दिवस पर अपने गांव के स्कूल में इसकी घोषणा की थी। दैनिक भास्कर डिजिटल की टीम जब रामप्यारी के घर पहुंची तो वे घर के बाहर आंगन में बैठीं थीं। बातचीत के दौरान रामप्यारी ने बताया-मेरा जन्म किस साल में हुआ ये तो अब याद नहीं। साल 1965 में मेरी शादी टोडाभीम के खिलचीपुर गांव में हुई। शादी के कई सालों तक मैं ससुराल में ही रही। कई सालों तक घर में बच्चों की कोई खुशी नहीं आई तो पति को दूसरी शादी करने के लिए बोल दिया। 10 साल बाद मैं वापस अपने पीहर आ गई। इस बात को 50 साल बीत चुके हैं। उसके बाद मैं वापस ससुराल नहीं गईं। मुझे लगा कि शायद मेरे वहां जाने से उनके (पति) नए जीवन में कोई परेशानी ना हो। रामप्यारी बोलीं-मेरे जाने के बाद गांव बेटी को याद रखें रामप्यारी ने बताया-मैं जब छोटी थी तो गांव में स्कूल तक नहीं था। इसलिए हमें कभी पढने का मौका तक नहीं मिला। स्कूल की बच्चियां अगर अच्छी सुविधाओं के साथ पढ़ लिए तो मैं सोचूंगी कि मैं भी पढ़ ली। मैं चाहती हूं कि मेरे जाने के बाद भी गांव के अपनी बेटी को याद रखें। हमारे घर की दीवार से सटा ही स्कूल है, हर रोज जब स्कूल के बच्चों का शोर सुनाई देता है तो मन में उनसे एक गहरा लगाव सा हो गया है। सरकारी छुट्टी के दिन जब स्कूल बंद रहता तो मन भी अजीब सा रहता है। इसलिए मैने तय किया कि इस दुनिया से जाने से पहले मैं इन स्कूल के बच्चों के लिए कुछ करूं। सरकार की पेंशन से चल रहा गुजारा रामप्यारी ने बताया-हम चार बहन और दो भाई हैं। जिसमें मैं सबसे बड़ी थी। सिंघानिया गांव में ही उनके दोनों भाई नथोली और धर्म सिंह रहते हैं। शादी के 10 साल बाद मैं वापस गांव आकर अपने पिता के पास रहने लगी। अब सरकार से मिलने वाली पेंशन से ही गुजारा चल जाता है। भाई बोले-2 साल से जिद कर रहीं थीं रामप्यारी के भाई नथोली ने बताया- मैं घर का सबसे छोटा बेटा हूं। मैं काफी छोटा था जब इनकी (रामप्यारी) की शादी हुई थी। मेरी बहन पिछले 2 साल से इच्छा जता रहीं हैं कि उनके गहनों से स्कूल में कमरे बनवा दिए जाए। इस बार जब उन्होंने काफी जिद की तो स्कूल के प्रिसिंपल श्याम बिहारी मीणा और गांव के पंच पटेलों से बातचीत की और गणतंत्र दिवस पर इसकी घोषणा की गई। पैसे गांव के पंच पटेलों को दे दिए गए हैं। अब वे कमेटी बनाकर स्कूल में कमरों का निर्माण कराएंगे। स्कूल प्रिंसिपल बोले-बुजुर्ग महिला का दान अनोखा स्कूल के प्रिंसिपल श्याम बिहारी मीण ने कहा-स्कूल में भामाशाहों का खूब सहयोग मिलता है। मगर रामप्यारी जी न अनोखा काम किया है। इन पैसों से स्कूल में कमरा बनवाया जाएगा। प्लेट लगाकर रामप्यारी का नाम भी लिखा जाएगा। सहयोग-कैलाश चंद मीणा … यह भी पढ़ें गांव वालों ने बनाया करोड़ों का स्कूल, सरकार को देंगे:बरामदे में बैठकर पढ़ते थे बच्चे, बाथरूम तक नहीं था; अगले महीने होगा उद्घाटन जालोर जिले से 18 किलोमीटर दूर नरसाणा गांव में साढ़े चार साल में 21 कमरों और इंडोर स्टेडियम के साथ यह सीनियर सेकेंडरी स्कूल बनकर तैयार है। गांव के बच्चों के लिए स्कूल भवन छोटा पड़ने लगा तो ग्रामीणों ने नई बिल्डिंग बनाने की मांग की। सरकार ने जमीन दी, लेकिन बजट अटक गया। हालात ऐसे थे कि बच्चों को बरामदे में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती थी। बाथरूम तक नहीं था। ऐसे में गांव की सरपंच के ससुर और ग्रामीणों ने मिलकर निर्णय लिया कि वे खुद के दम पर स्कूल बनाएंगे। स्कूल से पासआउट पुराने स्टूडेंट्स, प्रवासी और गांव के लोगों से करीब 4.50 करोड़ चंदा इकट्‌ठा किया और बच्चों के लिए भव्य स्कूल बना दिया। (पढ़ें पूरी खबर)

Jan 30, 2026 - 15:18
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महिला ने जेवर बेचकर स्कूल को दिए 6 लाख रुपए:बोलीं-मैं बूढ़ी हो गई, अब क्या गहने पहनूंगी; सरकारी पेंशन से चलता है गुजारा
मैं तो बूढी हो चुकी हूं। अब क्या गहने पहनूंगी। मेरे गांव में स्कूल नहीं था। मैं पढाई नहीं कर पाई। गांव के स्कूल में अगर अच्छे कमरे बनेंगे तो बच्चे पढ़ सकेंगे। करौली जिले के टोडाभीम से 40 किलोमीटर दूर गांव सिंघानिया की रहने वाली रामप्यारी (85) ने अपने गहने बेचकर गांव के राजकीय सीनियर सेकेंडरी स्कूल में 6 लाख रुपए की लागत से एक कमरा निर्माण करवाने की घोषणा की। रामप्यारी पिछले 50 साल से अपने पीहर में रह रहीं हैं। जहां सरकार से मिलने वाली पेंशन से उनका गुजारा चलता है। वहीं पूरा परिवार खेती पर निर्भर हैं। बुजुर्ग महिला की ये पहल पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई। गणतंत्र दिवस पर परिवार ने समाज के पंच पटेलों को पैसे सौंप दिए। इसके बाद कमेटी बनाकर स्कूल में कमरों का निर्माण किया जाएगा। रामप्यारी ने गणतंत्र दिवस पर अपने गांव के स्कूल में इसकी घोषणा की थी। दैनिक भास्कर डिजिटल की टीम जब रामप्यारी के घर पहुंची तो वे घर के बाहर आंगन में बैठीं थीं। बातचीत के दौरान रामप्यारी ने बताया-मेरा जन्म किस साल में हुआ ये तो अब याद नहीं। साल 1965 में मेरी शादी टोडाभीम के खिलचीपुर गांव में हुई। शादी के कई सालों तक मैं ससुराल में ही रही। कई सालों तक घर में बच्चों की कोई खुशी नहीं आई तो पति को दूसरी शादी करने के लिए बोल दिया। 10 साल बाद मैं वापस अपने पीहर आ गई। इस बात को 50 साल बीत चुके हैं। उसके बाद मैं वापस ससुराल नहीं गईं। मुझे लगा कि शायद मेरे वहां जाने से उनके (पति) नए जीवन में कोई परेशानी ना हो। रामप्यारी बोलीं-मेरे जाने के बाद गांव बेटी को याद रखें रामप्यारी ने बताया-मैं जब छोटी थी तो गांव में स्कूल तक नहीं था। इसलिए हमें कभी पढने का मौका तक नहीं मिला। स्कूल की बच्चियां अगर अच्छी सुविधाओं के साथ पढ़ लिए तो मैं सोचूंगी कि मैं भी पढ़ ली। मैं चाहती हूं कि मेरे जाने के बाद भी गांव के अपनी बेटी को याद रखें। हमारे घर की दीवार से सटा ही स्कूल है, हर रोज जब स्कूल के बच्चों का शोर सुनाई देता है तो मन में उनसे एक गहरा लगाव सा हो गया है। सरकारी छुट्टी के दिन जब स्कूल बंद रहता तो मन भी अजीब सा रहता है। इसलिए मैने तय किया कि इस दुनिया से जाने से पहले मैं इन स्कूल के बच्चों के लिए कुछ करूं। सरकार की पेंशन से चल रहा गुजारा रामप्यारी ने बताया-हम चार बहन और दो भाई हैं। जिसमें मैं सबसे बड़ी थी। सिंघानिया गांव में ही उनके दोनों भाई नथोली और धर्म सिंह रहते हैं। शादी के 10 साल बाद मैं वापस गांव आकर अपने पिता के पास रहने लगी। अब सरकार से मिलने वाली पेंशन से ही गुजारा चल जाता है। भाई बोले-2 साल से जिद कर रहीं थीं रामप्यारी के भाई नथोली ने बताया- मैं घर का सबसे छोटा बेटा हूं। मैं काफी छोटा था जब इनकी (रामप्यारी) की शादी हुई थी। मेरी बहन पिछले 2 साल से इच्छा जता रहीं हैं कि उनके गहनों से स्कूल में कमरे बनवा दिए जाए। इस बार जब उन्होंने काफी जिद की तो स्कूल के प्रिसिंपल श्याम बिहारी मीणा और गांव के पंच पटेलों से बातचीत की और गणतंत्र दिवस पर इसकी घोषणा की गई। पैसे गांव के पंच पटेलों को दे दिए गए हैं। अब वे कमेटी बनाकर स्कूल में कमरों का निर्माण कराएंगे। स्कूल प्रिंसिपल बोले-बुजुर्ग महिला का दान अनोखा स्कूल के प्रिंसिपल श्याम बिहारी मीण ने कहा-स्कूल में भामाशाहों का खूब सहयोग मिलता है। मगर रामप्यारी जी न अनोखा काम किया है। इन पैसों से स्कूल में कमरा बनवाया जाएगा। प्लेट लगाकर रामप्यारी का नाम भी लिखा जाएगा। सहयोग-कैलाश चंद मीणा … यह भी पढ़ें गांव वालों ने बनाया करोड़ों का स्कूल, सरकार को देंगे:बरामदे में बैठकर पढ़ते थे बच्चे, बाथरूम तक नहीं था; अगले महीने होगा उद्घाटन जालोर जिले से 18 किलोमीटर दूर नरसाणा गांव में साढ़े चार साल में 21 कमरों और इंडोर स्टेडियम के साथ यह सीनियर सेकेंडरी स्कूल बनकर तैयार है। गांव के बच्चों के लिए स्कूल भवन छोटा पड़ने लगा तो ग्रामीणों ने नई बिल्डिंग बनाने की मांग की। सरकार ने जमीन दी, लेकिन बजट अटक गया। हालात ऐसे थे कि बच्चों को बरामदे में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती थी। बाथरूम तक नहीं था। ऐसे में गांव की सरपंच के ससुर और ग्रामीणों ने मिलकर निर्णय लिया कि वे खुद के दम पर स्कूल बनाएंगे। स्कूल से पासआउट पुराने स्टूडेंट्स, प्रवासी और गांव के लोगों से करीब 4.50 करोड़ चंदा इकट्‌ठा किया और बच्चों के लिए भव्य स्कूल बना दिया। (पढ़ें पूरी खबर)