Ayatollah Khamenei की मौत के बाद दुनिया में क्या बदलेगा? मध्य पूर्व से वैश्विक राजनीति तक बड़े संकेत
ईरान की धार्मिक सत्ता की कई दशकों से केंद्रीय धुरी रहे अयातुल्ला अली खामनेई अब इस दुनिया में नहीं है। अमेरिका और इजराइल के साझा सैन्य अभियान में उनके मारे जाने के बाद मध्यपूर्व में हिंसा की आशंकाएं बढ़ गई है। खामनेई के शासन काल में ईरान दुनिया के लिए ...
डॉ.ब्रह्मदीप अलूने
(अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार)
ईरान की धार्मिक सत्ता की कई दशकों से केंद्रीय धुरी रहे अयातुल्ला अली खामनेई अब इस दुनिया में नहीं है। अमेरिका और इजराइल के साझा सैन्य अभियान में उनके मारे जाने के बाद मध्यपूर्व में हिंसा की आशंकाएं बढ़ गई है। खामनेई के शासन काल में ईरान दुनिया के लिए अबूझ पहेली की तरह था जो हिजबुल्ला,हमास और हुती जैसे आतंकी संगठनों को मजबूती देता रहा,वहीं पश्चिम के लिए संकट बढ़ाता रहा।
ALSO READ: Ayatollah Ali Khamenei की मौत पर भारत में कई जगह प्रदर्शन, Sanjay Singh बोले- एक युग का अंत अयातुल्ला अली खामनेई की मृत्यु को शिया दुनिया में एक महत्वपूर्ण क्षति के रूप में देखा जा सकता है,क्योंकि वे लंबे समय तक वैचारिक और राजनीतिक नेतृत्व के प्रमुख प्रतीक रहे। ईरान के सर्वोच्च नेता के रूप में उन्होंने अपने देश की नीतियों को दिशा देते हुए क्षेत्रीय स्तर पर भी शिया समुदायों के लिए एक सशक्त और आक्रमक आवाज का प्रतिनिधित्व किया। खामनेई के दौर में ईरान ने अमेरिका,इजराइल और पश्चिम के लिए मध्यपूर्व में न केवल कई दशकों से रास्ते बाधित कर रखे थे बल्कि वे मध्यपूर्व की राजनीति के केंद्रबिंदु भी बने रहे।
दुनिया के लिए ईरान की भू-रणनीतिक स्थिति बेहद खास है। वह पश्चिम एशिया,मध्य एशिया और दक्षिण एशिया के संगम पर स्थित है। उसके दक्षिण में फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ है,जहां से विश्व के बड़े हिस्से का तेल परिवहन होता है। उत्तर में कैस्पियन सागर और मध्य एशियाई देशों से उसकी निकटता उसे ऊर्जा और व्यापार मार्गों में महत्वपूर्ण बनाती है। ईरान अरब देशों,तुर्की और अफगानिस्तान के बीच संतुलन बिंदु पर है। इसी कारण ईरान क्षेत्रीय राजनीति,ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक कूटनीति में केंद्रीय भूमिका निभाता है। ईरान का तेल वैश्विक ऊर्जा बाजार और क्षेत्रीय राजनीति दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ईरान विश्व के प्रमुख तेल उत्पादक देशों में से एक है और उसके पास विशाल सिद्ध तेल भंडार हैं। फारस की खाड़ी के तट और दक्षिणी क्षेत्रों में बड़े तेल क्षेत्र स्थित हैं।
अयातुल्ला अली खामनेई की मृत्यु विश्व राजनीति में एक महत्वपूर्ण मोड़ सिद्ध हो सकती है,क्योंकि वे केवल ईरान के सर्वोच्च नेता ही नहीं,बल्कि मध्य-पूर्व की शक्ति-संतुलन व्यवस्था के केंद्रीय स्तंभ रहे हैं। उनके नेतृत्व में ईरान ने वैचारिक दृढ़ता,पश्चिम-विरोधी रुख और प्रतिरोध की धुरी की नीति को लंबे समय तक बनाएं रखा। ऐसे में उनकी मौत के बाद संभावित बदलाव कई स्तरों पर देखे जा सकते हैं। अयातुल्ला अली खामनेई ने ईरान की इस्लामी क्रांति की वैचारिक विरासत को कठोरता से आगे बढ़ाया था और ईरान को दुनिया में एक इस्लामी क्रांति के मजबूत प्रतिनिधि राष्ट्र के रूप में प्रस्तुत किया था। उनकी नेतृत्व शैली में धार्मिक मूल्यों,राष्ट्रीय स्वाभिमान और पश्चिमी प्रभाव से दूरी को विशेष महत्व मिला था। अब यह स्थिति बदल सकती है।
ALSO READ: US-Israel War On Iran : मिडिल ईस्ट में महायुद्ध, भारत में तेल, सोने-चांदी और शेयर बाजार पर पड़ेगा असर ईरान का नया शासन पश्चिम के प्रति अधिक व्यावहारिक या संतुलित दृष्टिकोण अपनाने को मजबूर होगा जिससे पश्चिम के साथ संबंधों,सामाजिक नीतियों और क्षेत्रीय रणनीति में परिवर्तन संभव है। यदि ईरान का नया शासन पश्चिम के प्रति अधिक व्यावहारिक रुख अपनाता है,तो सबसे पहले परमाणु कार्यक्रम पर वार्ता फिर से सक्रिय हो सकती है,जिससे प्रतिबंधों में आंशिक ढील मिल सकती है। इससे विदेशी निवेश और तेल निर्यात बढ़ने की संभावना बनेगी। सामाजिक स्तर पर महिलाओं के अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सांस्कृतिक नीतियों में सीमित उदारीकरण संभव है। क्षेत्रीय रणनीति में प्रत्यक्ष टकराव की बजाय कूटनीतिक संतुलन और पड़ोसी देशों के साथ संवाद पर जोर बढ़ सकता है। हालांकि,ये परिवर्तन क्रमिक और नियंत्रित ढंग से ही होंगे।
खामनेई के बाद ईरान का नया नेतृत्व अधिक व्यावहारिक नीति अपनाएगा और इससे अमेरिका और इज़राइल का प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रभाव भी बढ़ सकता है। यदि परमाणु वार्ता दोबारा शुरू होती है या प्रतिबंधों में ढील मिलती है,तो अमेरिका के साथ कूटनीतिक संपर्क बढ़ सकते हैं। इज़राइल को राहत मिल सकती है और क्षेत्रीय समीकरण भी बदल सकते हैं।
ईरान क्षेत्रीय राजनीति की एक प्रमुख धुरी रहा है। नेतृत्व परिवर्तन के दौर में उसकी विदेश नीति की दिशा को लेकर अनिश्चितता बढ़ सकती है, जिससे सऊदी अरब, इज़राइल और अमेरिका जैसे देशों की रणनीतियों में भी बदलाव संभव है। लेबनान, सीरिया, इराक और यमन में ईरान-समर्थित समूहों की नीति नई नेतृत्व शैली पर निर्भर करेगी। यदि ईरान अंदरूनी आर्थिक और सामाजिक मुद्दों पर अधिक ध्यान देता है, तो क्षेत्रीय हस्तक्षेप की तीव्रता घट सकती है।
मध्य-पूर्व की राजनीति लंबे समय से शिया–सुन्नी प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन से प्रभावित रही है। ईरान की प्रतिरोध नीति और लेबनान,सीरिया, इराक तथा यमन में उसकी सक्रिय भूमिका के कारण सुन्नी देशों को नाराज करती रही थी,यह स्थिति अब बदल सकती है। खामनेई की मृत्यु से वैश्विक ऊर्जा बाजार,सुरक्षा समीकरण और कूटनीतिक संबंधों को प्रभावित कर सकते हैं। यह बदलाव इस बात पर निर्भर करेगा कि नया नेतृत्व किस वैचारिक और रणनीतिक राह को चुनता है।
ईरान की स्थिति स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर मजबूत है। नेतृत्व परिवर्तन के दौरान यदि नीति में अस्थिरता आती है तो वैश्विक तेल आपूर्ति और ऊर्जा बाजार में अस्थायी उतार-चढ़ाव संभव है। सऊदी अरब, इज़राइल और तुर्की जैसे देश ईरान की नई नीति का आकलन करेंगे। यदि नया नेतृत्व अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाता है तो क्षेत्रीय तनाव कम हो सकता है। लेबनान,सीरिया,इराक और यमन में ईरान-समर्थित नेटवर्क की रणनीति बदल सकती है। इससे स्थानीय संघर्षों की दिशा और तीव्रता प्रभावित हो सकती है।
खामनेई के शासनकाल में प्रतिबंधों और पश्चिमी दूरी के कारण चीन और रूस ईरान के प्रमुख रणनीतिक साझेदार बने। ऊर्जा, रक्षा और कूटनीति में उनका प्रभाव बढ़ा। अब नेतृत्व परिवर्तन के बाद ईरान पश्चिम के साथ संतुलित संबंध बनाने की कोशिश कर करेगा,इससे चीन और रूस के हितों को झटका लग सकता है। ईरान में चीन की सिल्क रोड परियोजना का भविष्य अनिश्चित हो सकता है। चीन की सिल्क रोड परियोजना के लिए ईरान महत्वपूर्ण भू-रणनीतिक केंद्र है,जो एशिया,मध्य-पूर्व और यूरोप को जोड़ता है। ईरान का नया नेतृत्व पश्चिम के साथ संबंध सुधारने की दिशा में आगे बढ़ता है तो चीन पर उसकी अत्यधिक निर्भरता कम होगी और इससे चीन की कुछ परियोजनाओं की गति भी धीमी पड़ सकती है।
खामनेई की मृत्यु के बाद यदि ईरान की विदेश नीति में नरमी आती है और प्रत्यक्ष टकराव कम होता है,तो इज़राइल-ईरान के बीच तनाव कुछ हद तक रुक या धीमा पड़ सकता है। इससे क्षेत्रीय देशों के लिए कूटनीतिक विकल्पों का विस्तार होगा। ऐसी स्थिति में कुछ अरब देश,जो पहले ही अब्राहम अकार्ड के तहत इज़राइल के साथ संबंध सामान्य कर चुके हैं,और अधिक खुले रूप में आगे बढ़ सकते हैं। यदि क्षेत्रीय खतरे की धारणा कम होती है,तो इज़राइल को अतिरिक्त मान्यता मिलने की संभावना बढ़ सकती है। यह पूरी तरह ईरान की नई रणनीति,फिलिस्तीन मुद्दे की स्थिति और क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों पर निर्भर करेगा।
खामनेई के बाद ईरान का नया शासन सऊदी अरब की तरह क्रमिक सुधारों की राह अपनाता है तो देश में गहरे सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन संभव हैं। आर्थिक उदारीकरण, विदेशी निवेश के लिए खुलापन और युवाओं को अधिक अवसर देने की नीति ईरान की अर्थव्यवस्था को गति दे सकती है। सामाजिक स्तर पर महिलाओं और अभिव्यक्ति से जुड़े नियमों में संतुलित ढील दी जा सकती है। क्षेत्रीय राजनीति में टकराव को छोड़कर संवाद को प्राथमिकता मिलने से मध्य-पूर्व में स्थिरता बढ़ेगी। ऐसे बदलाव ईरान और विश्व दोनों के लिए सकारात्मक सिद्ध हो सकते हैं। कुल मिलाकर खामनेई की मौत के बाद ईरान की आंतरिक और विदेश नीति में बदलाव की उम्मीद बढ़ गई है। Edited by : Sudhir Sharma



