World War 3 : वर्ल्ड वॉर का खतरा मंडराया, क्या महायुद्ध में बदल जाएगा क्षेत्रीय संघर्ष, रूस और चीन का क्या है रुख
अमेरिका के 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' (Operation Epic Fury) और इजरायल के 'ऑपरेशन लायंस रोर' (Operation Lion's Roar) ने ईरान में तबाही मचा दी है। इस भीषण सैन्य कार्रवाई ने पूरी दुनिया दो भागों में बांद दिया है। यह जंग तेहरान और वॉशिंगटन के बीच की नहीं रह ...
अमेरिका के 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' (Operation Epic Fury) और इजरायल के 'ऑपरेशन लायंस रोर' (Operation Lion's Roar) ने ईरान में तबाही मचा दी है। इस भीषण सैन्य कार्रवाई ने पूरी दुनिया दो भागों में बांद दिया है। यह जंग तेहरान और वॉशिंगटन के बीच की नहीं रह गई बल्कि यह मध्य-पूर्व के भविष्य पर नियंत्रण की एक वैश्विक लड़ाई बन चुका है।
इससे अब वर्ल्ड वॉर (World War 3) का खतरा भी मंडरा रहा है। अमेरिका की विशाल सैन्य शक्ति का सामना करने के लिए ईरान अपने प्रॉक्सी संगठनों के नेटवर्क को सक्रिय कर रहा है। इसमें लेबनान का हिजबुल्लाह, यमन के हुथी विद्रोही और इराक-सीरिया के हथियारबंद शिया मिलिशिया शामिल हैं। आर्मी एक्सपर्ट्स का मानना है कि हालांकि यह एक विशाल और सीमाहीन क्षेत्रीय युद्ध है, लेकिन इसे अभी 'तीसरा विश्व युद्ध' नहीं कहा जा सकता।
पाकिस्तान ने अमेरिकी हमलों की तुरंत निंदा करते हुए ईरान के 'रक्षा के अधिकार' का समर्थन किया है, जबकि वह खुद अफगानिस्तान के साथ संघर्ष में उलझा हुआ है। ये अप्रत्याशित कदम संकेत दे रहे हैं कि युद्ध की चिंगारी अरब जगत से बाहर निकलकर परमाणु शक्ति संपन्न दक्षिण एशिया तक पहुंच सकती है।
क्या यह 'तीसरा विश्व युद्ध' है?
विश्व युद्ध तब माना जाता है जब महाशक्तियां सीधे तौर पर एक-दूसरे के सामने हों। जब तक रूस और चीन केवल कूटनीतिक और आर्थिक मदद तक सीमित हैं और अमेरिकी सेना पर सीधे गोली नहीं चलाते, तब तक यह एक विनाशकारी क्षेत्रीय संघर्ष ही बना रहेगा। रूस और चीन सीधे तौर पर युद्ध के मैदान में नहीं उतरे हैं, लेकिन वे ईरान के लिए एक 'भू-राजनीतिक ढाल' का काम कर रहे हैं।
दोनों महाशक्तियों ने संयुक्त राष्ट्र (UN) में अमेरिकी-इजरायली हमलों की कड़ी निंदा की है और वे इस अराजकता का लाभ उठाकर एक 'बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था' को बढ़ावा दे रहे हैं। सऊदी अरब, यूएई और बहरीन जैसे देश एक भयानक धर्मसंकट में हैं। हालांकि ये देश ईरान की सैन्य शक्ति कम होते देखना चाहते हैं, लेकिन वे तेहरान के पलटवार के सीधे निशाने पर हैं। उनकी धरती पर मौजूद अमेरिकी ठिकानों को निशाना बनाया जा रहा है, जिससे वे आर्थिक तबाही के डर से इस युद्ध में आधिकारिक तौर पर शामिल होने से बच रहे हैं।
ये देश सीधे युद्ध नहीं लड़ रहे, लेकिन ईरान को बचा रहे हैं और अमेरिका को घेर रहे हैं।
रूस: सैन्य तकनीक और ड्रोन के बदले कूटनीतिक समर्थन।
चीन: आर्थिक मदद और तेल आयात के जरिए ईरान की जीवनरेखा।
उत्तर कोरिया: मिसाइल तकनीक और गुप्त हथियारों की आपूर्ति।
तटस्थ लेकिन प्रभावित (Caught in the Middle)
ये वे देश हैं जो युद्ध की आग में जल सकते हैं लेकिन किसी का पक्ष नहीं ले रहे।
सऊदी अरब और यूएई: खुद के बचाव की मुद्रा में, अमेरिका को एयरस्पेस देने पर संशय।
तुर्की: नाटो सदस्य होने के बावजूद ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई से परहेज।
भारत: ऊर्जा आपूर्ति और चाबहार पोर्ट के हितों को देखते हुए 'वेट एंड वॉच' की स्थिति में।
नए वाइल्डकार्ड्स (The Wildcards)
पाकिस्तान : सार्वजनिक रूप से ईरान के रक्षा अधिकार का समर्थन कर रहा है।
कतर : मध्यस्थता की कोशिशों के साथ-साथ अमेरिकी बेस की सुरक्षा को लेकर चिंतित।Edited by : Sudhir Sharma



