स्वामी कृष्णानंद ने कहा- सृष्टि सेवा ही सच्ची भक्ति:परिवार, समाज, राष्ट्र और समस्त प्रकृति उसी विराट स्वरूप के अंग

संभल में चल रहे गीता ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने 'विश्व रूप दर्शन योग' का संदेश दिया। उन्होंने श्रद्धालुओं को बताया कि यह संपूर्ण सृष्टि ही ईश्वर का प्रत्यक्ष रूप है, इसलिए इसकी सेवा ही सच्ची भक्ति है। कार्यक्रम की शुरुआत पूजन के उपरांत अध्यक्ष दीपा वाष्र्णेय के भजन से हुई, जिसके बाद श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 11 का पाठ और विस्तृत व्याख्यान आयोजित किया गया। इस अवसर पर गीता व्यास स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने भगवान के विराट स्वरूप का वर्णन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि विश्व रूप दर्शन का अर्थ केवल एक दिव्य दृश्य देखना नहीं है, बल्कि यह उस चेतना का अनुभव है जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड एक ही सत्ता के रूप में प्रकट होता है। स्वामी कृष्णानंद ने बताया कि परिवार, समाज, राष्ट्र और समस्त प्रकृति उसी विराट स्वरूप के अंग हैं। इसलिए इनकी सेवा, सुरक्षा और संवर्धन ही वास्तविक भक्ति है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों में पूजा या भजन-कीर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा करना ही ईश्वर की सच्ची आराधना है। उन्होंने भक्ति की संकीर्ण होती परिभाषा पर चिंता व्यक्त की। स्वामी जी ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे राष्ट्र भक्ति, समाज भक्ति और परिवार भक्ति को अपने जीवन में अपनाएं। उनके अनुसार, कर्मयोग के माध्यम से इन सभी आयामों का समन्वय ही जीवन को सार्थक बनाता है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे, जिन्होंने इस संदेश को आत्मसात करने का संकल्प लिया। यह गीता ज्ञान यज्ञ आध्यात्मिक जागरूकता के साथ-साथ समाज में सकारात्मक सोच और कर्तव्यबोध को भी मजबूत कर रहा है।

May 5, 2026 - 21:55
 0
स्वामी कृष्णानंद ने कहा- सृष्टि सेवा ही सच्ची भक्ति:परिवार, समाज, राष्ट्र और समस्त प्रकृति उसी विराट स्वरूप के अंग
संभल में चल रहे गीता ज्ञान यज्ञ के पांचवें दिन स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने 'विश्व रूप दर्शन योग' का संदेश दिया। उन्होंने श्रद्धालुओं को बताया कि यह संपूर्ण सृष्टि ही ईश्वर का प्रत्यक्ष रूप है, इसलिए इसकी सेवा ही सच्ची भक्ति है। कार्यक्रम की शुरुआत पूजन के उपरांत अध्यक्ष दीपा वाष्र्णेय के भजन से हुई, जिसके बाद श्रीमद्भगवद्गीता के अध्याय 11 का पाठ और विस्तृत व्याख्यान आयोजित किया गया। इस अवसर पर गीता व्यास स्वामी कृष्णानंद जी महाराज ने भगवान के विराट स्वरूप का वर्णन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि विश्व रूप दर्शन का अर्थ केवल एक दिव्य दृश्य देखना नहीं है, बल्कि यह उस चेतना का अनुभव है जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड एक ही सत्ता के रूप में प्रकट होता है। स्वामी कृष्णानंद ने बताया कि परिवार, समाज, राष्ट्र और समस्त प्रकृति उसी विराट स्वरूप के अंग हैं। इसलिए इनकी सेवा, सुरक्षा और संवर्धन ही वास्तविक भक्ति है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सच्ची भक्ति केवल मंदिरों में पूजा या भजन-कीर्तन तक सीमित नहीं है, बल्कि निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा करना ही ईश्वर की सच्ची आराधना है। उन्होंने भक्ति की संकीर्ण होती परिभाषा पर चिंता व्यक्त की। स्वामी जी ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे राष्ट्र भक्ति, समाज भक्ति और परिवार भक्ति को अपने जीवन में अपनाएं। उनके अनुसार, कर्मयोग के माध्यम से इन सभी आयामों का समन्वय ही जीवन को सार्थक बनाता है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित थे, जिन्होंने इस संदेश को आत्मसात करने का संकल्प लिया। यह गीता ज्ञान यज्ञ आध्यात्मिक जागरूकता के साथ-साथ समाज में सकारात्मक सोच और कर्तव्यबोध को भी मजबूत कर रहा है।