श्यामा बाबू के संकल्प की जीत, विवेकानंद के विचारों की प्रीति: बंगाल में राष्ट्रवाद का नया सूर्योदय

बंगाल केवल एक भौगोलिक भूभाग नहीं है, बल्कि यह वह विचार है जिसने आधुनिक भारत की आधारशिला रखी। आज का दिन इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित होने वाला है, क्योंकि यह मात्र एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि उस माटी की अपनी जड़ों की ओर वापसी है, जिसने कभी 'वंदे मातरम्' के उद्घोष से पूरे आर्यावर्त को जगाया था। यह जीत उस संकल्प की सिद्धि है जो दशकों से बंगाल की गलियों में मौन था, किंतु मरा नहीं था। आज जब बंगाल में राष्ट्रवाद का भगवा ध्वज लहरा रहा है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि गंगासागर की लहरें डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के उन बलिदानों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हैं, जिन्होंने एक विधान, एक प्रधान और एक निशान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। यह उस विचारधारा की विजय है जो मानती है कि राष्ट्र सर्वोपरि है और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही भारत की नियति है।डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो भारतीय जनसंघ के प्रणेता थे, उनके विचारों की प्रासंगिकता आज बंगाल की इस ऐतिहासिक जीत में साफ झलकती है। उन्होंने उस समय बंगाल के विभाजन के संकट को समझा था और यह सुनिश्चित किया था कि बंगाल का एक हिस्सा भारतीय संस्कृति और अस्मिता के साथ सुरक्षित रहे। आज उनकी आत्मा निश्चित रूप से तृप्त हो रही होगी, क्योंकि जिस बंगाल को वैचारिक शून्यता और तुष्टीकरण की राजनीति ने जकड़ लिया था, उसने अब अपने सबसे प्रतापी पुत्र के सपनों को साकार करने का मार्ग चुन लिया है। यह जीत बताती है कि समय कितना भी क्यों न बदल जाए, सत्य और राष्ट्रवाद की धारा कभी सूखती नहीं है; वह बस सही समय की प्रतीक्षा करती है। बंगाल ने आज यह सिद्ध कर दिया है कि वह अपनी गौरवशाली विरासत को पुनः प्राप्त करने के लिए तत्पर है।इस परिवर्तन की गहराई को समझने के लिए हमें स्वामी विवेकानंद के उन संदेशों को स्मरण करना होगा, जिन्होंने विश्व पटल पर भारत की आध्यात्मिक श्रेष्ठता को स्थापित किया था। संघ और उससे प्रेरित सभी समवैचारिक संगठनों के लिए विवेकानंद केवल एक पथ-प्रदर्शक नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद के जीवंत प्रतीक हैं। उन्होंने कहा था कि "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।" बंगाल की जनता ने आज उसी मंत्र को आत्मसात किया है। दशकों की राजनीतिक हिंसा, वैचारिक दमन और सांस्कृतिक विस्मृति के बाद, बंगाल की चेतना जागृत हुई है। यह उस 'सिंह-गर्जना' की गूंज है जिसने कभी शिकागो के मंच से दुनिया को हिला दिया था। आज विवेकानंद की उस कर्मठता और आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की विजय हुई है, जो समावेशी भी है और अजेय भी।इसे भी पढ़ें: उद्योग जगत की खुशी बंगाल के फिर से निवेश और नौकरियों का केंद्र बनने का संकेत हैगंगोत्री से गंगासागर तक शुरू हुई यह संकल्प यात्रा अब अपनी पूर्णता की ओर अग्रसर है। जिस प्रकार गंगा नदी हिमालय की दुर्गम चोटियों को चीरते हुए मैदानों को सींचती है और अंततः बंगाल की खाड़ी में जाकर सागर से एकाकार हो जाती है, उसी प्रकार राष्ट्रवाद की यह लहर उत्तर से दक्षिण और पश्चिम से पूर्व की ओर बहते हुए आज बंगाल के हृदय में समा गई है। यह यात्रा केवल सत्ता के परिवर्तन की नहीं, बल्कि व्यवस्था के परिवर्तन और विचारों के शुद्धिकरण की यात्रा है। 'वंदे मातरम्' के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने जिस भारत माता की कल्पना की थी, वह सुजलाम-सुफलाम होने के साथ-साथ शक्तिस्वरूपा भी थी। आज बंगाल ने उसी शक्ति की आराधना की है और दिखा दिया है कि माँ भारती के सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता।बंगाल के इस ऐतिहासिक जनादेश के पीछे उन अनगिनत कार्यकर्ताओं का लहू और पसीना है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी राष्ट्रवाद का दीप जलाए रखा। यह उन बलिदानियों को नमन करने का दिन है जिन्होंने अपनी आँखों में 'सोनार बांग्ला' का सपना संजोया था—एक ऐसा बंगाल जो सांप्रदायिकता से मुक्त हो, जहाँ विकास की धारा अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और जहाँ दुर्गा पूजा का शंखनाद बिना किसी भय के सुनाई दे। आज की यह जीत बंगाल की उस महान परंपरा का सम्मान है जिसमें चैतन्य महाप्रभु की भक्ति, सुभाष चंद्र बोस का शौर्य और रवींद्रनाथ टैगोर की लेखनी का प्रभाव समाहित है। यह जीत घोषणा करती है कि बंगाल अब केवल पीछे मुड़कर नहीं देखेगा, बल्कि नए भारत के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाएगा।यह ऐतिहासिक दिन इस विश्वास को सुदृढ़ करता है कि विचारधारा की जड़ें यदि सत्य में हों, तो उसे कोई भी दमनकारी शक्ति मिटा नहीं सकती। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' और स्वामी विवेकानंद के 'मानव निर्माण' के संकल्प ने आज बंगाल की भूमि पर एक नए युग का सूत्रपात किया है। यह जीत केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनरुत्थान है। आज बंगाल मुस्कुरा रहा है, क्योंकि उसने अपनी पहचान को पुनः प्राप्त कर लिया है। 'वंदे मातरम्' का स्वर आज बंगाल के आकाश में पहले से कहीं अधिक तीव्र और स्पष्ट सुनाई दे रहा है, जो पूरे भारत को यह संदेश दे रहा है कि राष्ट्रवाद की विजय ही शाश्वत विजय है।- भारत भूषण अरजरिया(मीडियाध्यक्ष दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ)

May 5, 2026 - 21:56
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श्यामा बाबू के संकल्प की जीत, विवेकानंद के विचारों की प्रीति: बंगाल में राष्ट्रवाद का नया सूर्योदय
बंगाल केवल एक भौगोलिक भूभाग नहीं है, बल्कि यह वह विचार है जिसने आधुनिक भारत की आधारशिला रखी। आज का दिन इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित होने वाला है, क्योंकि यह मात्र एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि उस माटी की अपनी जड़ों की ओर वापसी है, जिसने कभी 'वंदे मातरम्' के उद्घोष से पूरे आर्यावर्त को जगाया था। यह जीत उस संकल्प की सिद्धि है जो दशकों से बंगाल की गलियों में मौन था, किंतु मरा नहीं था। आज जब बंगाल में राष्ट्रवाद का भगवा ध्वज लहरा रहा है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि गंगासागर की लहरें डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के उन बलिदानों को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हैं, जिन्होंने एक विधान, एक प्रधान और एक निशान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था। यह उस विचारधारा की विजय है जो मानती है कि राष्ट्र सर्वोपरि है और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही भारत की नियति है।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जो भारतीय जनसंघ के प्रणेता थे, उनके विचारों की प्रासंगिकता आज बंगाल की इस ऐतिहासिक जीत में साफ झलकती है। उन्होंने उस समय बंगाल के विभाजन के संकट को समझा था और यह सुनिश्चित किया था कि बंगाल का एक हिस्सा भारतीय संस्कृति और अस्मिता के साथ सुरक्षित रहे। आज उनकी आत्मा निश्चित रूप से तृप्त हो रही होगी, क्योंकि जिस बंगाल को वैचारिक शून्यता और तुष्टीकरण की राजनीति ने जकड़ लिया था, उसने अब अपने सबसे प्रतापी पुत्र के सपनों को साकार करने का मार्ग चुन लिया है। यह जीत बताती है कि समय कितना भी क्यों न बदल जाए, सत्य और राष्ट्रवाद की धारा कभी सूखती नहीं है; वह बस सही समय की प्रतीक्षा करती है। बंगाल ने आज यह सिद्ध कर दिया है कि वह अपनी गौरवशाली विरासत को पुनः प्राप्त करने के लिए तत्पर है।

इस परिवर्तन की गहराई को समझने के लिए हमें स्वामी विवेकानंद के उन संदेशों को स्मरण करना होगा, जिन्होंने विश्व पटल पर भारत की आध्यात्मिक श्रेष्ठता को स्थापित किया था। संघ और उससे प्रेरित सभी समवैचारिक संगठनों के लिए विवेकानंद केवल एक पथ-प्रदर्शक नहीं, बल्कि राष्ट्रवाद के जीवंत प्रतीक हैं। उन्होंने कहा था कि "उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।" बंगाल की जनता ने आज उसी मंत्र को आत्मसात किया है। दशकों की राजनीतिक हिंसा, वैचारिक दमन और सांस्कृतिक विस्मृति के बाद, बंगाल की चेतना जागृत हुई है। यह उस 'सिंह-गर्जना' की गूंज है जिसने कभी शिकागो के मंच से दुनिया को हिला दिया था। आज विवेकानंद की उस कर्मठता और आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की विजय हुई है, जो समावेशी भी है और अजेय भी।

इसे भी पढ़ें: उद्योग जगत की खुशी बंगाल के फिर से निवेश और नौकरियों का केंद्र बनने का संकेत है

गंगोत्री से गंगासागर तक शुरू हुई यह संकल्प यात्रा अब अपनी पूर्णता की ओर अग्रसर है। जिस प्रकार गंगा नदी हिमालय की दुर्गम चोटियों को चीरते हुए मैदानों को सींचती है और अंततः बंगाल की खाड़ी में जाकर सागर से एकाकार हो जाती है, उसी प्रकार राष्ट्रवाद की यह लहर उत्तर से दक्षिण और पश्चिम से पूर्व की ओर बहते हुए आज बंगाल के हृदय में समा गई है। यह यात्रा केवल सत्ता के परिवर्तन की नहीं, बल्कि व्यवस्था के परिवर्तन और विचारों के शुद्धिकरण की यात्रा है। 'वंदे मातरम्' के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने जिस भारत माता की कल्पना की थी, वह सुजलाम-सुफलाम होने के साथ-साथ शक्तिस्वरूपा भी थी। आज बंगाल ने उसी शक्ति की आराधना की है और दिखा दिया है कि माँ भारती के सम्मान के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

बंगाल के इस ऐतिहासिक जनादेश के पीछे उन अनगिनत कार्यकर्ताओं का लहू और पसीना है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी राष्ट्रवाद का दीप जलाए रखा। यह उन बलिदानियों को नमन करने का दिन है जिन्होंने अपनी आँखों में 'सोनार बांग्ला' का सपना संजोया था—एक ऐसा बंगाल जो सांप्रदायिकता से मुक्त हो, जहाँ विकास की धारा अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे और जहाँ दुर्गा पूजा का शंखनाद बिना किसी भय के सुनाई दे। आज की यह जीत बंगाल की उस महान परंपरा का सम्मान है जिसमें चैतन्य महाप्रभु की भक्ति, सुभाष चंद्र बोस का शौर्य और रवींद्रनाथ टैगोर की लेखनी का प्रभाव समाहित है। यह जीत घोषणा करती है कि बंगाल अब केवल पीछे मुड़कर नहीं देखेगा, बल्कि नए भारत के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाएगा।

यह ऐतिहासिक दिन इस विश्वास को सुदृढ़ करता है कि विचारधारा की जड़ें यदि सत्य में हों, तो उसे कोई भी दमनकारी शक्ति मिटा नहीं सकती। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के 'सांस्कृतिक राष्ट्रवाद' और स्वामी विवेकानंद के 'मानव निर्माण' के संकल्प ने आज बंगाल की भूमि पर एक नए युग का सूत्रपात किया है। यह जीत केवल एक राजनीतिक घटना नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनरुत्थान है। आज बंगाल मुस्कुरा रहा है, क्योंकि उसने अपनी पहचान को पुनः प्राप्त कर लिया है। 'वंदे मातरम्' का स्वर आज बंगाल के आकाश में पहले से कहीं अधिक तीव्र और स्पष्ट सुनाई दे रहा है, जो पूरे भारत को यह संदेश दे रहा है कि राष्ट्रवाद की विजय ही शाश्वत विजय है।

- भारत भूषण अरजरिया
(मीडियाध्यक्ष दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ)