पश्चिम एशिया संकट का असर: RBI ने जीडीपी ग्रोथ अनुमान घटाकर 6.6% किया, जानें भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या होगा प्रभाव

पश्चिम एशिया (Middle East) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और संघर्ष के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक ने शुक्रवार को चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर (GDP Growth Rate) के अनुमान को घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले, अप्रैल की मौद्रिक नीति समीक्षा में आरबीआई ने जीडीपी वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था। आरबीआई के अनुसार, ऊर्जा और अन्य कच्चे माल की ऊंची कीमतें तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में जारी व्यवधान घरेलू आर्थिक गतिविधियों पर असर डाल सकते हैं।इसे भी पढ़ें: तमिलनाडु की राजनीति में बड़ा उलटफेर! अन्नामलाई ने छोड़ी BJP, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने मंजूर किया इस्तीफा केंद्रीय बैंक ने कहा कि ऊर्जा और अन्य वस्तुओं की ऊंची कीमतें तथा आपूर्ति में जारी व्यवधान आर्थिक गतिविधियों पर असर डाल सकते हैं। आरबीआई के अनुसार, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में लंबे समय तक बने रहने वाले व्यवधान, वैश्विक वित्तीय बाजारों में बढ़ती अस्थिरता एवं मौसम से जुड़े झटके घरेलू वृद्धि के लिए जोखिम बने हुए हैं। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने चालू वित्त वर्ष की दूसरी द्विमासिक मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए कहा कि कई उच्च-आवृत्ति संकेतकों से पता चलता है कि संघर्ष शुरू होने के बाद से घरेलू आर्थिक गतिविधियां काफी हद तक स्थिर बनी हुई हैं।इसे भी पढ़ें: Prabhasakshi NewsRoom: Kumar Mangalam Birla ने RSS की तारीफों के पुल बाँधे, संघ प्रमुख Bhagwat बोले, 'भारत विश्वगुरु बनकर रहेगा' उन्होंने कहा कि भारत के विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के पीएमआई से पता चलता है कि दोनों क्षेत्र मजबूत बने हुए हैं एवं व्यावसायिक अपेक्षाएं अब भी सकारात्मक हैं। मांग पक्ष पर निजी खपत अब तक मजबूत बनी हुई है। बढ़ती लागत के दबाव के बावजूद स्थिर निवेश ने भी अपनी गति बनाए रखी है। माल निर्यात में अप्रैल, 2026 में ढुलाई और बीमा लागत के अधिक होने के बावजूद मजबूत वृद्धि दर्ज की। सेवा निर्यात भी बेहतर बना हुआ है जो कृत्रिम मेधा (एआई) को लेकर चिंताओं के बावजूद निरंतर मांग को दर्शाता है। मल्होत्रा ने कहा कि कुल मिलाकर आर्थिक स्थिति व्यापक रूप से मजबूत बनी हुई है। उन्होंने कहा, ‘‘ आगे चलकर ऊर्जा और अन्य कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि तथा आपूर्ति व्यवधान आर्थिक गतिविधियों पर दबाव डाल सकते हैं। प्रभावित वस्तुओं में आयात विविधीकरण से आपूर्ति में सुधार हो सकता है, लेकिन इसकी लागत अधिक होगी।’’ गवर्नर ने कहा कि कुल प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि संघर्ष कितने समय तक चलता है, आपूर्ति श्रृंखलाओं के सामान्य होने में कितना समय लगता है और विभिन्न हितधारकों के बीच भार का बंटवारा कैसे होता है। उन्होंने साथ ही कहा कि कमजोर वैश्विक मांग और ऊंची लॉजिस्टिक लागत वस्तु निर्यात के लिए चुनौती हैं, जबकि सेवा निर्यात अपनी गति बनाए रखेगा क्योंकि भारतीय सेवाओं की मांग मजबूत बनी हुई है। मल्होत्रा ने कहा, ‘‘ इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसमें पहली तिमाही में इसके 6.6 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 6.3 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.5 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है।’’ वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक गतिरोध के कारण परिदृश्य अनिश्चित बना हुआ है, क्योंकि ऊर्जा कीमतों में तेज बढ़ोतरी और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान आर्थिक गतिविधियों में बाधा डाल रहे हैं। उन्होंने कहा कि जोखिम से बचाव की भावना और सुरक्षित निवेश की मांग विदेशी मुद्रा बाजारों में अस्थिरता बढ़ा रही है, जिससे कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं में गिरावट का रुख देखा जा रहा है।

Jun 5, 2026 - 21:41
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पश्चिम एशिया संकट का असर: RBI ने जीडीपी ग्रोथ अनुमान घटाकर 6.6% किया, जानें भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या होगा प्रभाव

पश्चिम एशिया (Middle East) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और संघर्ष के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय बैंक ने शुक्रवार को चालू वित्त वर्ष 2026-27 के लिए भारत की आर्थिक वृद्धि दर (GDP Growth Rate) के अनुमान को घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है। इससे पहले, अप्रैल की मौद्रिक नीति समीक्षा में आरबीआई ने जीडीपी वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया था। आरबीआई के अनुसार, ऊर्जा और अन्य कच्चे माल की ऊंची कीमतें तथा वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में जारी व्यवधान घरेलू आर्थिक गतिविधियों पर असर डाल सकते हैं।

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केंद्रीय बैंक ने कहा कि ऊर्जा और अन्य वस्तुओं की ऊंची कीमतें तथा आपूर्ति में जारी व्यवधान आर्थिक गतिविधियों पर असर डाल सकते हैं। आरबीआई के अनुसार, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में लंबे समय तक बने रहने वाले व्यवधान, वैश्विक वित्तीय बाजारों में बढ़ती अस्थिरता एवं मौसम से जुड़े झटके घरेलू वृद्धि के लिए जोखिम बने हुए हैं। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने चालू वित्त वर्ष की दूसरी द्विमासिक मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए कहा कि कई उच्च-आवृत्ति संकेतकों से पता चलता है कि संघर्ष शुरू होने के बाद से घरेलू आर्थिक गतिविधियां काफी हद तक स्थिर बनी हुई हैं।

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उन्होंने कहा कि भारत के विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के पीएमआई से पता चलता है कि दोनों क्षेत्र मजबूत बने हुए हैं एवं व्यावसायिक अपेक्षाएं अब भी सकारात्मक हैं। मांग पक्ष पर निजी खपत अब तक मजबूत बनी हुई है। बढ़ती लागत के दबाव के बावजूद स्थिर निवेश ने भी अपनी गति बनाए रखी है। माल निर्यात में अप्रैल, 2026 में ढुलाई और बीमा लागत के अधिक होने के बावजूद मजबूत वृद्धि दर्ज की। सेवा निर्यात भी बेहतर बना हुआ है जो कृत्रिम मेधा (एआई) को लेकर चिंताओं के बावजूद निरंतर मांग को दर्शाता है।

मल्होत्रा ने कहा कि कुल मिलाकर आर्थिक स्थिति व्यापक रूप से मजबूत बनी हुई है। उन्होंने कहा, ‘‘ आगे चलकर ऊर्जा और अन्य कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि तथा आपूर्ति व्यवधान आर्थिक गतिविधियों पर दबाव डाल सकते हैं। प्रभावित वस्तुओं में आयात विविधीकरण से आपूर्ति में सुधार हो सकता है, लेकिन इसकी लागत अधिक होगी।’’ गवर्नर ने कहा कि कुल प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि संघर्ष कितने समय तक चलता है, आपूर्ति श्रृंखलाओं के सामान्य होने में कितना समय लगता है और विभिन्न हितधारकों के बीच भार का बंटवारा कैसे होता है। उन्होंने साथ ही कहा कि कमजोर वैश्विक मांग और ऊंची लॉजिस्टिक लागत वस्तु निर्यात के लिए चुनौती हैं, जबकि सेवा निर्यात अपनी गति बनाए रखेगा क्योंकि भारतीय सेवाओं की मांग मजबूत बनी हुई है।

मल्होत्रा ने कहा, ‘‘ इन सभी कारकों को ध्यान में रखते हुए 2026-27 के लिए वास्तविक जीडीपी वृद्धि 6.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसमें पहली तिमाही में इसके 6.6 प्रतिशत, दूसरी तिमाही में 6.3 प्रतिशत, तीसरी तिमाही में 6.5 प्रतिशत और चौथी तिमाही में 6.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है।’’

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर उन्होंने कहा कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक गतिरोध के कारण परिदृश्य अनिश्चित बना हुआ है, क्योंकि ऊर्जा कीमतों में तेज बढ़ोतरी और वैश्विक आपूर्ति शृंखला में व्यवधान आर्थिक गतिविधियों में बाधा डाल रहे हैं। उन्होंने कहा कि जोखिम से बचाव की भावना और सुरक्षित निवेश की मांग विदेशी मुद्रा बाजारों में अस्थिरता बढ़ा रही है, जिससे कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं में गिरावट का रुख देखा जा रहा है।