आज शनि व्रत है, इस दिन प्रदोष काल में शिव जी की पूजा करने से सुख, वैभव और धन-समृद्धि की प्राप्ति होती है। शनि प्रदोष व्रत से सभी तरह की मनोकामनाएं भी पूरी होती हैं, शनिवार के दिन प्रदोष व्रत होने के कारण उसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है तो आइए हम आपको शनि प्रदोष व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।
जानें शनि प्रदोष व्रत के बारे में
हिंदू धर्म में शनि प्रदोष के व्रत का विशेष महत्व होता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार शनि प्रदोष व्रत इस बार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष त्रयोदशी तिथि को रखा जाएगा। शनिवार के दिन त्रयोदशी तिथि होने के कारण इसका महत्व काफी है, जिसे शनि प्रदोष व्रत कहते हैं। इस शनि प्रदोष व्रत पर एक साथ कई योग बन रहे हैं। शनि प्रदोष व्रत पर भगवान शिव की विशेष पूजा-आराधना करने का महत्व होता है। संतान प्राप्ति के लिए शनि प्रदोष के व्रत का विशेष महत्व होता है। इस व्रत को रखने से भगवान शिव और न्याय के देवता शनिदेव दोनों की कृपा मिलती है। इस दिन प्रदोष काल यानी सूर्यास्त के समय भगवान शिव का पूजन किया जाता है।
शनि प्रदोष व्रत पूजा मुहूर्त 2026
शास्त्रों के अनुसार शनि प्रदोष पर पूजा के मुहूर्त का विशेष महत्व होता है। जो लोग शनि प्रदोष व्रत रखते हैं उनके लिए पूजा का समय शाम 7 बजकर 23 मिनट से होगा और इसका समापन रात 09 बजकर 23 मिनट पर होगा। प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा करने का विशेष महत्व होता है।
शनि प्रदोष व्रत पर ऐसे करें पूजा, होगा लाभ
पंडितों के अनुसार इस व्रत में सूर्यास्त के समय (प्रदोष काल) का विशेष महत्व होता है, सूर्यास्त से लगभग डेढ़ घंटे पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। प्रदोष काल में भगवान शिव, माता पार्वती और नंदी जी का पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक करें। पूजा के दौरान "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करें। शिव पुराण में वर्णित शनि प्रदोष व्रत कथा को सुनें या पढ़ें। पूरे दिन निराहार (उपवास) रहना सर्वोत्तम है, लेकिन यदि संभव न हो तो फलाहार या साबूदाना और ताजे फलों का सेवन शाम को पूजा के बाद किया जा सकता है।
शनि प्रदोष व्रत का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार हर माह दो प्रदोष व्रत रखे जाते हैं। एक शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर और दूसरा कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर। प्रदोष व्रत भगवान शिव की पूजा के लिए समर्पित होता है और ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से हर तरह की मनोकामना पूरी होती है। जब शनिवार के दिन प्रदोष व्रत पड़ता है, तो इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है। शनि प्रदोष व्रत रखने से भगवान शिव के साथ शनिदेव की भी विशेष कृपा मिलती है। इस व्रत को करने से कुंडली में मौजूद शनि दोष दूर होता है।
शनि प्रदोष व्रत पर कैसे करें शनि देव को प्रसन्न
पंडितों के अनुसार झूठ, क्रोध, अपशब्द और किसी का अपमान करने से बचना शुभ माना जाता है। मेहनत, समय की पाबंदी और बुजुर्गों का सम्मान शनि से जुड़े महत्वपूर्ण आचरण माने जाते हैं। शनि प्रदोष व्रत के दिन शनि मंदिर जाकर सरसों के तेल का दीपक जलाएं. श्रद्धा के साथ “ॐ शं शनैश्चराय नमः” मंत्र का जाप करें। पीपल वृक्ष के नीचे दीपदान करना भी शुभ माना जाता है। जरूरतमंदों को काले तिल, उड़द दाल, कंबल या भोजन का दान करें। एक काले कपड़े में काले उड़द, सवा किलो अनाज, दो लड्डू, कोयला व लोहे की कील लपेटकर बहते जल में प्रवाहित कर दें। शनि प्रदोष के दिन काली गाय को बूंदी के लड्डू खिलाएं। हनुमान चालीसा का पाठ करें, बजरंगबली की कृपा से रोग, दोष का नाश होता है।
शनि प्रदोष से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक नगर सेठ थे। उनके घर में धन-धान्य और सभी सुख-सुविधाएं मौजूद थीं, लेकिन संतान न होने के कारण सेठ और सेठानी हमेशा दुःखी और चिंतित रहते थे। संतान की चाह में एक दिन सेठ-सेठानी ने संन्यास लेने का निश्चय किया और घर-बार छोड़कर तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। मार्ग में उन्हें एक विशाल वन में अत्यंत तेजस्वी और ध्यानी 'शांडिल्य ऋषि' मिले। ऋषि के आश्रम में पहुंचकर सेठ और सेठानी ने उनसे आशीर्वाद लिया। मुनि शांडिल्य ने अंतर्ध्यान होकर उनकी पीड़ा जान ली और उन्हें शनि प्रदोष व्रत करने का सुझाव दिया। मुनि ने बताया कि शनिदेव के गुरु स्वयं भगवान शिव हैं, इसलिए जो भी भक्त शनि प्रदोष के दिन प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा और व्रत करता है, उसके सभी शनि संबंधी दोष दूर हो जाते हैं। मुनिराज के आदेश के अनुसार, सेठ और सेठानी ने पूरी निष्ठा और विधि-विधान से शनि प्रदोष का व्रत और शिवजी का पूजन किया। व्रत के प्रभाव से सेठानी को एक अत्यंत सुंदर और गुणी पुत्र की प्राप्ति हुई। इसके बाद से ही जीवन में संतान सुख, धन-वैभव और शनि देव के प्रकोप से बचने के लिए शनि प्रदोष व्रत रखने की परंपरा आरंभ हुई।
शनि प्रदोष के दिन शिवलिंग पर अर्पित करें ये सामग्री
शास्त्रों के अनुसार पूजा के दौरान सबसे पहले शिवलिंग पर शुद्ध जल और गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद पंचामृत अर्पित करें। भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और सफेद चंदन अर्पित करें। अंत में दीप और धूप जलाकर ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र का 108 बार जाप करें। श्रद्धा से अर्पित की गई ये सामग्री भगवान शिव को अत्यंत प्रिय होती है। इसके अलावा गन्ने का रस, शहद और संभव हो तो गाय के कच्चे दूध से भी अभिषेक किया जा सकता है। साथ में यह भी ध्यान रखें कि पूजा में उपयोग की जाने वाली सभी सामग्री शुद्ध और ताजी हो।
शनि प्रदोष पर इन गलतियों से जरूर बचें
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार शिवलिंग पर कभी भी हल्दी, सिंदूर और तुलसी के पत्ते न चढ़ाएं। व्रत के दिन सात्विकता बनाए रखें और मांस-मदिरा या तामसिक भोजन से पूरी तरह दूर रहें। व्रत का पारण अगले दिन सूर्योदय के बाद ही करें।
शनि प्रदोष व्रत के दिन इन बातों का रखें विशेष ध्यान
पंडितों के अनुसार शनि प्रदोष व्रत का दिन बहुत खास होता है इसलिए इस दिन शिवलिंग पर हल्दी, सिंदूर और तुलसी पत्र अर्पित न करें। बेलपत्र हमेशा ताजा और साफ होना चाहिए। पूजा के समय क्रोध करने या अपशब्द बोलने से बचें। प्रदोष काल में पूजा जल्दबाजी में न करें, पूरे मन से करें। इस दिन तामसिक भोजन, शराब और मांसाहार से दूरी बनाए रखें।
- प्रज्ञा पाण्डेय