चंडीगढ़ में बिजली उपभोक्ताओं को हाईकोर्ट से राहत:टेकओवर से पहले का बकाया नहीं वसूल सकेगी CPDL, ट्रांसफर डेट से पहले नहीं कर सकते रिकवरी
चंडीगढ़ के हजारों बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत देते हुए पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि चंडीगढ़ पावर डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड अपने आधिकारिक टेकओवर से पहले की अवधि के बिजली बिल का बकाया उपभोक्ताओं से नहीं वसूल सकती। कोर्ट ने 14.77 लाख रुपए की रेट्रोस्पेक्टिव डिमांड को रद्द करते हुए कहा कि कंपनी को पूर्व अवधि के बकाये की वसूली का अधिकार कानूनी रूप से कभी दिया ही नहीं गया। यह फैसला जस्टिस जगमोहन बंसल की बेंच ने सुनाया। अचानक ज्यादा पैसे की डिमांड भेज दी चंडीगढ़ में यह मामला उन लोगों से जुड़ा है जिनके दुकान, दफ्तर या अन्य गैर-रिहायशी बिजली कनेक्शन हैं। 17 नवंबर 2025 को कंपनी ने इनके कनेक्शनों की जांच की। जांच के बाद CPDL ने कहा कि पहले बिजली बिल बनाते समय गलत गणना (मल्टीप्लिकेशन फैक्टर) लगाया गया था, जिसकी वजह से उपभोक्ताओं से कम बिल लिया गया। इसी आधार पर 10 दिसंबर 2025 को कंपनी ने पुराने समय का हिसाब जोड़कर अचानक ज्यादा पैसे की डिमांड भेज दी। उपभोक्ताओं का कहना था कि उनकी कोई गलती नहीं है और इतने समय बाद पुराने बिल का पैसा मांगना गलत है। इसलिए उन्होंने इस फैसले को चुनौती देते हुए पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। ट्रांसफर डेट से पहले नहीं कर सकते रिकवरी पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत ने पूरे बिजली निजीकरण सिस्टम को ध्यान से समझा। कोर्ट ने देखा कि CPDL कंपनी भले 2022 में बन गई थी, लेकिन उसे चंडीगढ़ में बिजली सप्लाई का पूरा काम और जिम्मेदारी असल में 31 जनवरी 2025 से मिली। यानी इससे पहले तक बिजली व्यवस्था सरकार/प्रशासन के पास ही थी, कंपनी के पास नहीं। इसी आधार पर कोर्ट ने साफ कहा कि 31 जनवरी 2025 ही असली ट्रांसफर डेट मानी जाएगी। इसलिए इस तारीख से पहले के समय का कोई भी पुराना बकाया बिल CPDL उपभोक्ताओं से नहीं वसूल सकती। ‘लायबिलिटी’ और ‘एसेट’ में फर्क बताया CPDL ने दलील दी कि ट्रांसफर स्कीम के तहत उसे पूर्व देनदारियां भी मिली हैं, इसलिए वह पुराने बकाये की वसूली कर सकती है। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ‘लायबिलिटी’ का मतलब कंपनी की देनदारी है, उपभोक्ता की नहीं। संभावित वसूली कंपनी की संपत्ति (एसेट) हो सकती है, लेकिन उपभोक्ता से जबरन वसूली का अधिकार नहीं बनता। इस फैसले से शहर के हजारों बिजली उपभोक्ताओं को राहत मिली है। अब टेकओवर से पहले के बिलों की दोबारा गणना कर भारी-भरकम मांग थोपना संभव नहीं होगा। हाईकोर्ट ने साफ किया कि निजीकरण का मतलब यह नहीं है कि कंपनी को असीमित वसूली का अधिकार मिल जाए।
चंडीगढ़ के हजारों बिजली उपभोक्ताओं को बड़ी राहत देते हुए पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि चंडीगढ़ पावर डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड अपने आधिकारिक टेकओवर से पहले की अवधि के बिजली बिल का बकाया उपभोक्ताओं से नहीं वसूल सकती। कोर्ट ने 14.77 लाख रुपए की रेट्रोस्पेक्टिव डिमांड को रद्द करते हुए कहा कि कंपनी को पूर्व अवधि के बकाये की वसूली का अधिकार कानूनी रूप से कभी दिया ही नहीं गया। यह फैसला जस्टिस जगमोहन बंसल की बेंच ने सुनाया। अचानक ज्यादा पैसे की डिमांड भेज दी चंडीगढ़ में यह मामला उन लोगों से जुड़ा है जिनके दुकान, दफ्तर या अन्य गैर-रिहायशी बिजली कनेक्शन हैं। 17 नवंबर 2025 को कंपनी ने इनके कनेक्शनों की जांच की। जांच के बाद CPDL ने कहा कि पहले बिजली बिल बनाते समय गलत गणना (मल्टीप्लिकेशन फैक्टर) लगाया गया था, जिसकी वजह से उपभोक्ताओं से कम बिल लिया गया। इसी आधार पर 10 दिसंबर 2025 को कंपनी ने पुराने समय का हिसाब जोड़कर अचानक ज्यादा पैसे की डिमांड भेज दी। उपभोक्ताओं का कहना था कि उनकी कोई गलती नहीं है और इतने समय बाद पुराने बिल का पैसा मांगना गलत है। इसलिए उन्होंने इस फैसले को चुनौती देते हुए पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी। ट्रांसफर डेट से पहले नहीं कर सकते रिकवरी पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अदालत ने पूरे बिजली निजीकरण सिस्टम को ध्यान से समझा। कोर्ट ने देखा कि CPDL कंपनी भले 2022 में बन गई थी, लेकिन उसे चंडीगढ़ में बिजली सप्लाई का पूरा काम और जिम्मेदारी असल में 31 जनवरी 2025 से मिली। यानी इससे पहले तक बिजली व्यवस्था सरकार/प्रशासन के पास ही थी, कंपनी के पास नहीं। इसी आधार पर कोर्ट ने साफ कहा कि 31 जनवरी 2025 ही असली ट्रांसफर डेट मानी जाएगी। इसलिए इस तारीख से पहले के समय का कोई भी पुराना बकाया बिल CPDL उपभोक्ताओं से नहीं वसूल सकती। ‘लायबिलिटी’ और ‘एसेट’ में फर्क बताया CPDL ने दलील दी कि ट्रांसफर स्कीम के तहत उसे पूर्व देनदारियां भी मिली हैं, इसलिए वह पुराने बकाये की वसूली कर सकती है। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि ‘लायबिलिटी’ का मतलब कंपनी की देनदारी है, उपभोक्ता की नहीं। संभावित वसूली कंपनी की संपत्ति (एसेट) हो सकती है, लेकिन उपभोक्ता से जबरन वसूली का अधिकार नहीं बनता। इस फैसले से शहर के हजारों बिजली उपभोक्ताओं को राहत मिली है। अब टेकओवर से पहले के बिलों की दोबारा गणना कर भारी-भरकम मांग थोपना संभव नहीं होगा। हाईकोर्ट ने साफ किया कि निजीकरण का मतलब यह नहीं है कि कंपनी को असीमित वसूली का अधिकार मिल जाए।