214 करोड़ के टेंडर में गड़बड़ी, भास्कर के पास सबूत:कम बजट बताकर 33.95 करोड़ महंगे में दिया ठेका, शर्त बदलकर 8.32 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान
इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) से जुड़े प्रोजेक्ट में करोड़ों की गड़बड़ियों का खुलासा हुआ है। महालेखाकार की ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया… धांधलियों का खुलासा करती विभाग की ऑडिट रिपोर्ट भास्कर टीम के हाथ लगी। इसके बाद हमने मौके पर जाकर भी पड़ताल की। सरकारी फाइलों में जो काम पूरा हो चुका है, उसकी जमीनी हकीकत चौंकाने वाली थी। इन्वेस्टिगेशन स्टोरी में पढ़िए- कैसे IGNP से जुड़े सैकड़ों करोड़ के प्रोजेक्ट में धांधली की गई… ऐसे सामने आई धांधली महालेखाकार कार्यालय ने अप्रैल 2022 से मार्च 2025 तक के कार्यों की ऑडिट की। यूं तो यह विभाग की सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन ऑडिट कमेटी की जांच में टेंडर प्रक्रिया, कंपनियों को मनमाने भुगतान और गंभीर धांधली के चौंकाने वाले खुलासे हुए। धांधली नंबर- 1 : सस्ता टेंडर रद्द कर महंगे में दिया, 33.95 करोड़ का नुकसान हुआ इसके 9 महीने बाद उसी काम का ठेका दूसरी कंपनी मैसर्स गोपी कृष्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड को अधिक दर पर दे दिया गया। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, इससे सरकार पर 33.95 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ा। चीफ इंजीनियर का तर्क- केंद्र ने पैसा रोका इंदिरा गांधी नहर परियोजना के चीफ इंजीनियर विवेक गोयल का जवाब था- इस योजना में केंद्र और राज्य सरकार की 50-50 पार्टनरशिप थी। वर्क ऑर्डर के कुछ समय बाद ही केंद्र ने CADWM को बंद कर दिया था। इसके बाद एक भी पैसा योजना में नहीं दिया। इसलिए स्टेट ने आधे पैसे होते ही काम को रुकवा दिया था। बाद में राज्य सरकार ने फैसला लिया कि बचा आधा काम भी करवाया जाएगा। अब आधे काम के लिए नया टेंडर करना था, उसमें तो ज्यादा रेट आनी ही थी। भास्कर पड़ताल- विभाग के पास पड़े थे 700 करोड़ से ज्यादा विभाग ने बजट की कमी का हवाला दिया, जबकि रिकॉर्ड के अनुसार सैकड़ों करोड़ रुपए उपलब्ध थे। महालेखाकार ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट में साफ टिप्पणी की है कि कोलायत खंड अभियंता के पास वर्ष 2020-21 में 790 करोड़ 73 लाख 35 हजार रुपए का बजट उपलब्ध था। वर्ष 2021-22 में खर्च के बाद भी 403 करोड़ 51 लाख 79 हजार रुपए शेष बचे थे। इसके बावजूद टेंडर रद्द किया गया। अगर बजट की कोई कमी थी तो इस संबंध में केंद्र से कोई पत्राचार तक नहीं किया गया। धांधली नंबर- 2 : नियम बदलकर ठेकेदार को 8.32 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान मैसर्स एलसी इंफ्रा कंपनी को 214.40 करोड़ का ठेका 9.63% कम दर पर दिया गया था। नियमानुसार उसे भुगतान करते समय उतनी कटौती होनी थी। शुरुआती 14 बिल तक तो नियम लागू रहा। बाद के 20 बिलों में कटौती घटाकर 0.891% कर दी गई। इस बदलाव से ठेकेदार को 8.32 करोड़ रुपए का अतिरिक्त भुगतान किया गया। चीफ इंजीनियर का तर्क- आइटम महंगे हो गए थे अतिरिक्त भुगतान को लेकर भास्कर के सवाल पर चीफ इंजीनियर विवेक गोयल ने तर्क देते हुए बताया कि यह टेंडर आइटम रेट के आधार पर मांगा गया था। निर्माण के दौरान कुछ आइटम महंगे हो गए थे। ऐसे में समझौता वार्ता के दौरान ठेकेदार को रियायत दी गई। यही जवाब ऑडिट टीम को भी भेजा गया था। लेकिन जवाब से संतुष्ट नहीं होने पर सितंबर 2025 में ही अतिरिक्त राशि की वसूली के निर्देश दिए गए। धांधली नंबर-3 : कंपनी को 25.78 करोड़ भुगतान, फिर भी नहीं पहुंची बिजली भास्कर ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि कागजों में प्रोजेक्ट पूरा, लेकिन जमीनी स्तर पर अधूरा था। कई जगह बिजली के केवल पोल लगे थे, तार गायब थे। हम रणधीसर गांव पहुंचे तो… चीफ इंजीनियर विवेक गोयल से सवाल-जवाब सवाल : डिग्गियों पर बिजली अभी तक नहीं पहुंची और विभाग ने 2019 में ही डिस्कॉम को 25 करोड़ दे दिए, किसानों को फायदा नहीं मिला? जवाब : डिस्कॉम ने सभी जगह लाइनें बिछा दी हैं और कनेक्शन भी दे रहे हैं। वह अपना काम कर रही है। धांधली नंबर- 4 : सर्वे की अनदेखी, बिना सहमति किसानों की जमीन पर बनाई डिग्गियां डिग्गियां कहां बनेंगी? इसके लिए एक फर्म को भुगतान कर सर्वे कराया गया था। सर्वे को पास भी कर दिया गया था। ठेका कंपनी को सर्वे के अनुसार चिह्नित जगहों पर ही डिग्गियों का निर्माण करना था, लेकिन मनमाने ढंग से डिग्गियां किसानों की उपजाऊ जमीन में उनकी बिना अनुमति के ही बना दी गईं। केस 1 : सर्वे के अनुसार रणधीसर गांव में डिग्गी 3/6 खसरा नंबर पर बनानी थी। नियमों की अनदेखी कर डिग्गी खसरा नंबर 6/7 में किसान गोपाल सिंह की उपजाऊ जमीन में बना दी। किसान गोपाल सिंह सोलंकी ने बताया- मेरी 25 बीघा जमीन है। यह नहर के बिल्कुल पास है। सर्वे करने वाली कंपनी ने काफी दूर दो डिग्गियों का निर्माण पास किया था। लेकिन ठेकेदार ने अपनी लागत (पैसा) बचाने के चक्कर में नियमों के विरुद्ध जाकर दोनों डिग्गियां मेरे खेत में बना दीं। इसके लिए न तो मुझसे अनुमति ली और न ही अब तक कोई मुआवजा दिया है। इन डिग्गियों के निर्माण के कारण मेरी 8 बीघा उपजाऊ जमीन पूरी तरह बर्बाद हो गई है। विडंबना इस बात की है कि मेरे ही खेत में डिग्गियां होने के बावजूद, मैं स्वयं उस पानी का उपयोग करने का हकदार नहीं हूं। केस 2 : रणधीसर माइनर के ही सत्यनारायण पुत्र देवीलाल ने बताया कि सर्वे के अनुसार पानी की डिग्गी खसरा नंबर 49/9 पर बननी थी, लेकिन ठेकेदार ने खसरा नंबर 49/8 में मेरे खेत में बना दी। इससे करीब 8 बीघा जमीन खराब हो गई। धांधली नंबर- 5 : काम अधूरा, फिर भी 3.60 करोड़ का मेंटेनेंस भुगतान ऑडिट के दौरान एक और धांधली सामने आई। जिस प्रोजेक्ट का काम पूरा ही नहीं हुआ, उसकी मेंटेनेंस के लिए ठेकेदार फर्म मैसर्स लक्ष्मी को 3.60 करोड़ रुपए का एडवांस भुगतान भी कर दिया गया। भास्कर टीम ने खेतों में जाकर पड़ताल की तो कई जगह डाली गई पाइप लाइन और उनकी हौदियां पूरी तरह से टूटी हुई मिलीं। कई जगह बिजली के पोल थे, लेकिन वहां तार गायब थे। अब बड़ा सवाल यही है कि इन लाइनों में जब पानी आएगा, तब उसका मेंटेनेंस कौन देखेगा। विभाग का तर्क विभाग ने तर्क दिया कि बिजली कंपनी द्वारा बिजली की सप्लाई नहीं होने के कारण ऑपरेशन संभव नहीं था। कंपनी
इंदिरा गांधी नहर परियोजना (IGNP) से जुड़े प्रोजेक्ट में करोड़ों की गड़बड़ियों का खुलासा हुआ है। महालेखाकार की ऑडिट रिपोर्ट में सामने आया… धांधलियों का खुलासा करती विभाग की ऑडिट रिपोर्ट भास्कर टीम के हाथ लगी। इसके बाद हमने मौके पर जाकर भी पड़ताल की। सरकारी फाइलों में जो काम पूरा हो चुका है, उसकी जमीनी हकीकत चौंकाने वाली थी। इन्वेस्टिगेशन स्टोरी में पढ़िए- कैसे IGNP से जुड़े सैकड़ों करोड़ के प्रोजेक्ट में धांधली की गई… ऐसे सामने आई धांधली महालेखाकार कार्यालय ने अप्रैल 2022 से मार्च 2025 तक के कार्यों की ऑडिट की। यूं तो यह विभाग की सामान्य प्रक्रिया है, लेकिन ऑडिट कमेटी की जांच में टेंडर प्रक्रिया, कंपनियों को मनमाने भुगतान और गंभीर धांधली के चौंकाने वाले खुलासे हुए। धांधली नंबर- 1 : सस्ता टेंडर रद्द कर महंगे में दिया, 33.95 करोड़ का नुकसान हुआ इसके 9 महीने बाद उसी काम का ठेका दूसरी कंपनी मैसर्स गोपी कृष्ण इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड को अधिक दर पर दे दिया गया। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, इससे सरकार पर 33.95 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ा। चीफ इंजीनियर का तर्क- केंद्र ने पैसा रोका इंदिरा गांधी नहर परियोजना के चीफ इंजीनियर विवेक गोयल का जवाब था- इस योजना में केंद्र और राज्य सरकार की 50-50 पार्टनरशिप थी। वर्क ऑर्डर के कुछ समय बाद ही केंद्र ने CADWM को बंद कर दिया था। इसके बाद एक भी पैसा योजना में नहीं दिया। इसलिए स्टेट ने आधे पैसे होते ही काम को रुकवा दिया था। बाद में राज्य सरकार ने फैसला लिया कि बचा आधा काम भी करवाया जाएगा। अब आधे काम के लिए नया टेंडर करना था, उसमें तो ज्यादा रेट आनी ही थी। भास्कर पड़ताल- विभाग के पास पड़े थे 700 करोड़ से ज्यादा विभाग ने बजट की कमी का हवाला दिया, जबकि रिकॉर्ड के अनुसार सैकड़ों करोड़ रुपए उपलब्ध थे। महालेखाकार ने अपनी ऑडिट रिपोर्ट में साफ टिप्पणी की है कि कोलायत खंड अभियंता के पास वर्ष 2020-21 में 790 करोड़ 73 लाख 35 हजार रुपए का बजट उपलब्ध था। वर्ष 2021-22 में खर्च के बाद भी 403 करोड़ 51 लाख 79 हजार रुपए शेष बचे थे। इसके बावजूद टेंडर रद्द किया गया। अगर बजट की कोई कमी थी तो इस संबंध में केंद्र से कोई पत्राचार तक नहीं किया गया। धांधली नंबर- 2 : नियम बदलकर ठेकेदार को 8.32 करोड़ का अतिरिक्त भुगतान मैसर्स एलसी इंफ्रा कंपनी को 214.40 करोड़ का ठेका 9.63% कम दर पर दिया गया था। नियमानुसार उसे भुगतान करते समय उतनी कटौती होनी थी। शुरुआती 14 बिल तक तो नियम लागू रहा। बाद के 20 बिलों में कटौती घटाकर 0.891% कर दी गई। इस बदलाव से ठेकेदार को 8.32 करोड़ रुपए का अतिरिक्त भुगतान किया गया। चीफ इंजीनियर का तर्क- आइटम महंगे हो गए थे अतिरिक्त भुगतान को लेकर भास्कर के सवाल पर चीफ इंजीनियर विवेक गोयल ने तर्क देते हुए बताया कि यह टेंडर आइटम रेट के आधार पर मांगा गया था। निर्माण के दौरान कुछ आइटम महंगे हो गए थे। ऐसे में समझौता वार्ता के दौरान ठेकेदार को रियायत दी गई। यही जवाब ऑडिट टीम को भी भेजा गया था। लेकिन जवाब से संतुष्ट नहीं होने पर सितंबर 2025 में ही अतिरिक्त राशि की वसूली के निर्देश दिए गए। धांधली नंबर-3 : कंपनी को 25.78 करोड़ भुगतान, फिर भी नहीं पहुंची बिजली भास्कर ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि कागजों में प्रोजेक्ट पूरा, लेकिन जमीनी स्तर पर अधूरा था। कई जगह बिजली के केवल पोल लगे थे, तार गायब थे। हम रणधीसर गांव पहुंचे तो… चीफ इंजीनियर विवेक गोयल से सवाल-जवाब सवाल : डिग्गियों पर बिजली अभी तक नहीं पहुंची और विभाग ने 2019 में ही डिस्कॉम को 25 करोड़ दे दिए, किसानों को फायदा नहीं मिला? जवाब : डिस्कॉम ने सभी जगह लाइनें बिछा दी हैं और कनेक्शन भी दे रहे हैं। वह अपना काम कर रही है। धांधली नंबर- 4 : सर्वे की अनदेखी, बिना सहमति किसानों की जमीन पर बनाई डिग्गियां डिग्गियां कहां बनेंगी? इसके लिए एक फर्म को भुगतान कर सर्वे कराया गया था। सर्वे को पास भी कर दिया गया था। ठेका कंपनी को सर्वे के अनुसार चिह्नित जगहों पर ही डिग्गियों का निर्माण करना था, लेकिन मनमाने ढंग से डिग्गियां किसानों की उपजाऊ जमीन में उनकी बिना अनुमति के ही बना दी गईं। केस 1 : सर्वे के अनुसार रणधीसर गांव में डिग्गी 3/6 खसरा नंबर पर बनानी थी। नियमों की अनदेखी कर डिग्गी खसरा नंबर 6/7 में किसान गोपाल सिंह की उपजाऊ जमीन में बना दी। किसान गोपाल सिंह सोलंकी ने बताया- मेरी 25 बीघा जमीन है। यह नहर के बिल्कुल पास है। सर्वे करने वाली कंपनी ने काफी दूर दो डिग्गियों का निर्माण पास किया था। लेकिन ठेकेदार ने अपनी लागत (पैसा) बचाने के चक्कर में नियमों के विरुद्ध जाकर दोनों डिग्गियां मेरे खेत में बना दीं। इसके लिए न तो मुझसे अनुमति ली और न ही अब तक कोई मुआवजा दिया है। इन डिग्गियों के निर्माण के कारण मेरी 8 बीघा उपजाऊ जमीन पूरी तरह बर्बाद हो गई है। विडंबना इस बात की है कि मेरे ही खेत में डिग्गियां होने के बावजूद, मैं स्वयं उस पानी का उपयोग करने का हकदार नहीं हूं। केस 2 : रणधीसर माइनर के ही सत्यनारायण पुत्र देवीलाल ने बताया कि सर्वे के अनुसार पानी की डिग्गी खसरा नंबर 49/9 पर बननी थी, लेकिन ठेकेदार ने खसरा नंबर 49/8 में मेरे खेत में बना दी। इससे करीब 8 बीघा जमीन खराब हो गई। धांधली नंबर- 5 : काम अधूरा, फिर भी 3.60 करोड़ का मेंटेनेंस भुगतान ऑडिट के दौरान एक और धांधली सामने आई। जिस प्रोजेक्ट का काम पूरा ही नहीं हुआ, उसकी मेंटेनेंस के लिए ठेकेदार फर्म मैसर्स लक्ष्मी को 3.60 करोड़ रुपए का एडवांस भुगतान भी कर दिया गया। भास्कर टीम ने खेतों में जाकर पड़ताल की तो कई जगह डाली गई पाइप लाइन और उनकी हौदियां पूरी तरह से टूटी हुई मिलीं। कई जगह बिजली के पोल थे, लेकिन वहां तार गायब थे। अब बड़ा सवाल यही है कि इन लाइनों में जब पानी आएगा, तब उसका मेंटेनेंस कौन देखेगा। विभाग का तर्क विभाग ने तर्क दिया कि बिजली कंपनी द्वारा बिजली की सप्लाई नहीं होने के कारण ऑपरेशन संभव नहीं था। कंपनी का भुगतान काफी समय से लंबित था। ऐसे में सक्षम अधिकारी से स्वीकृति लेने के बाद टेंडर की इस शर्त को हटाकर भुगतान कर दिया गया। ऑडिट कमेटी ने इस जवाब पर सवाल उठाते हुए लिखा कि यह टेंडर इंदिरा गांधी नहर बोर्ड की एंपावर्ड कमेटी की बैठक में विभाग के उप सचिव की अनुमति से जारी हुआ था। फिर निचले स्तर के अधिकारियों से किस आधार पर परमिशन लेकर शर्त में बदलाव किए गए। किसान संघ बोला- अधिकारियों-ठेकेदारों की मिलीभगत से नुकसान किसान संघ के बीकानेर अध्यक्ष शंभू सिंह ने आरोप लगाया कि इंदिरा गांधी नहर परियोजना में अधिकारियों-ठेकेदारों की मिलीभगत से घटिया निर्माण हुआ। इससे कई डिग्गियां उपयोग से पहले ही टूट गईं। 2019 तक बिजली पहुंचनी थी, लेकिन अब तक न पहुंचने से किसानों को नुकसान हो रहा है। सितंबर 2025 में तैयार हुई थी ऑडिट रिपोर्ट
कोलायत लिफ्ट खंड, इंदिरा गांधी नहर परियाेजना बीकानेर की ऑडिट 18 अगस्त 2025 से 9 सितंबर 2025 तक की गई थी। यह ऑडिट सहायक लेखा परीक्षा अधिकारी रमेशचंद्र महावर, प्रवीण तंवर और सहायक पर्यवेक्षक बसंत बल्लभ पंडा की कमेटी ने की थी। ------ ये इन्वेस्टिगेटिव खबरें भी पढ़िए… 1. लेपर्ड-टाइगर मारकर, खाल और अंगों की दलाली:कीमत 5 से 10 लाख, मूंछ के बाल तक का सौदा, भास्कर के कैमरे में खूंखार शिकारी लेपर्ड हो या टाइगर, ऑर्डर मिलते ही शिकार करेंगे...ताजा खाल से लेकर दांत, नाखून उतारकर सब कुछ बेच देंगे। दैनिक भास्कर ने ऐसे ही खतरनाक शिकारियों और वन्यजीवों के अंगों और खाल की तस्करी करने वाले रैकेट को कैमरे पर एक्सपोज किया। करीब 45 दिन की पड़ताल के बाद टीम शिकारियों की गैंग तक पहुंची…(CLICK कर पढ़ें) 2. SMS अस्पताल में दलाल गैंग, पैसे दो तो तुरंत MRI:रिपोर्टर बने मरीज, न चेकअप, न लाइन में लगे, 3 हजार लेकर 30 मिनट में जांच प्रदेश के सबसे बड़े SMS अस्पताल में मुफ्त होने वाली एमआरआई-सीटी स्कैन जैसी जांचों के लिए दलाल पैसे वसूल रहे हैं। न डॉक्टर के पास जाने की जरूरत न लाइन में लगने का झंझट। दलालों को मुंहमांगा पैसा दो, आधे घंटे में नंबर आ जाएगा…(CLICK कर पढ़ें)