लखनऊ में जन आंदोलनों की भूमिका पर मंथन:लोकतंत्र, नागरिक भागीदारी और समावेशी समाज निर्माण पर चर्चा

लखनऊ में 'राह-ए-उम्मीद' पैनल चर्चा का आयोजन किया गया, जिसमें लोकतंत्र को मजबूत बनाने, नागरिक भागीदारी बढ़ाने और समावेशी समाज के निर्माण में जन आंदोलनों की भूमिका पर मंथन हुआ। वक्ताओं ने जोर दिया कि सामाजिक बदलाव तभी संभव है जब सभी वर्गों की आवाज को मंच मिले और नागरिक सक्रिय रूप से भागीदारी करें। कैसरबाग स्थित लखनऊ बायोस्कोप में हुई इस चर्चा में क्वीयर सामाजिक कार्यकर्ता रित्विक दास, सामाजिक कार्यकर्ता साबिका अब्बास और वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक शरत प्रधान ने अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम का संचालन माधवी कुकरेजा ने किया। समावेशी मंचों की आवश्यकता पर विस्तृत चर्चा वक्ताओं ने ऐतिहासिक रूप से जन आंदोलनों की सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में बताया। उन्होंने वर्तमान चुनौतियों, नागरिक सहभागिता और अधिक समावेशी मंचों की आवश्यकता पर भी विस्तृत चर्चा की। रित्विक दास ने अपने संबोधन में कहा कि लोकतंत्र और जन आंदोलन एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने बताया कि एक स्वस्थ लोकतंत्र लोगों को संगठित होने, अपनी बात रखने और बदलाव की मांग करने का अवसर प्रदान करता है, जिससे दोनों और अधिक मजबूत होते हैं। समुदायों की आवाज को समान महत्व देने की जरूरत सामाजिक कार्यकर्ता साबिका अब्बास ने विभिन्न सामाजिक संघर्षों के बीच आपसी जुड़ाव को समझने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार, अलग-अलग समुदायों के एक साथ आने से बड़े मुद्दों पर सार्थक संवाद संभव होता है। उन्होंने हाशिए पर पड़े और कम सुने जाने वाले समुदायों की आवाज़ को समान महत्व देने की जरूरत भी रेखांकित की। वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान ने नागरिकों में राजनीतिक जागरूकता को लोकतंत्र की मजबूती के लिए अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा कि लोगों को अपने समय के मुद्दों को समझने के साथ यह भी तय करना होगा कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसा समाज और भविष्य चाहते हैं। रित्विक दास ने दिल्ली में हाल के प्रदर्शनों में अपनी भागीदारी का अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि इन आंदोलनों में देश के विभिन्न हिस्सों और विविध पृष्ठभूमि के लोग एक साथ आए, जिससे नए अनुभवों को समझने, पुरानी धारणाओं से आगे बढ़ने और साझा सीख प्राप्त करने का अवसर मिला।

Aug 1, 2026 - 22:14
 0
लखनऊ में जन आंदोलनों की भूमिका पर मंथन:लोकतंत्र, नागरिक भागीदारी और समावेशी समाज निर्माण पर चर्चा
लखनऊ में 'राह-ए-उम्मीद' पैनल चर्चा का आयोजन किया गया, जिसमें लोकतंत्र को मजबूत बनाने, नागरिक भागीदारी बढ़ाने और समावेशी समाज के निर्माण में जन आंदोलनों की भूमिका पर मंथन हुआ। वक्ताओं ने जोर दिया कि सामाजिक बदलाव तभी संभव है जब सभी वर्गों की आवाज को मंच मिले और नागरिक सक्रिय रूप से भागीदारी करें। कैसरबाग स्थित लखनऊ बायोस्कोप में हुई इस चर्चा में क्वीयर सामाजिक कार्यकर्ता रित्विक दास, सामाजिक कार्यकर्ता साबिका अब्बास और वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक शरत प्रधान ने अपने विचार साझा किए। कार्यक्रम का संचालन माधवी कुकरेजा ने किया। समावेशी मंचों की आवश्यकता पर विस्तृत चर्चा वक्ताओं ने ऐतिहासिक रूप से जन आंदोलनों की सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में बताया। उन्होंने वर्तमान चुनौतियों, नागरिक सहभागिता और अधिक समावेशी मंचों की आवश्यकता पर भी विस्तृत चर्चा की। रित्विक दास ने अपने संबोधन में कहा कि लोकतंत्र और जन आंदोलन एक-दूसरे के पूरक हैं। उन्होंने बताया कि एक स्वस्थ लोकतंत्र लोगों को संगठित होने, अपनी बात रखने और बदलाव की मांग करने का अवसर प्रदान करता है, जिससे दोनों और अधिक मजबूत होते हैं। समुदायों की आवाज को समान महत्व देने की जरूरत सामाजिक कार्यकर्ता साबिका अब्बास ने विभिन्न सामाजिक संघर्षों के बीच आपसी जुड़ाव को समझने की आवश्यकता पर बल दिया। उनके अनुसार, अलग-अलग समुदायों के एक साथ आने से बड़े मुद्दों पर सार्थक संवाद संभव होता है। उन्होंने हाशिए पर पड़े और कम सुने जाने वाले समुदायों की आवाज़ को समान महत्व देने की जरूरत भी रेखांकित की। वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान ने नागरिकों में राजनीतिक जागरूकता को लोकतंत्र की मजबूती के लिए अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा कि लोगों को अपने समय के मुद्दों को समझने के साथ यह भी तय करना होगा कि वे आने वाली पीढ़ियों के लिए कैसा समाज और भविष्य चाहते हैं। रित्विक दास ने दिल्ली में हाल के प्रदर्शनों में अपनी भागीदारी का अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि इन आंदोलनों में देश के विभिन्न हिस्सों और विविध पृष्ठभूमि के लोग एक साथ आए, जिससे नए अनुभवों को समझने, पुरानी धारणाओं से आगे बढ़ने और साझा सीख प्राप्त करने का अवसर मिला।