आईआईएम लखनऊ में 'नारी 2047' विचार-मंथन संपन्न:विकसित भारत में महिलाओं की भूमिका पर हुई गंभीर चर्चा
भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) लखनऊ में 'निर्णय, नेतृत्व, निर्माण: नारी 2047' विषय पर दो दिवसीय विचार-मंथन संपन्न हो गया। लोकनीति भारत और आईआईएम लखनऊ के सहयोग में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य विकसित भारत 2047 के लक्ष्य में महिलाओं की भूमिका पर चर्चा करना था। विचार-मंथन के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि केवल नीतियां बनाने से बदलाव नहीं आएगा, बल्कि जमीनी स्तर पर महिलाओं की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. संजय सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि 33% आरक्षण पर्याप्त नहीं है। उन्होंने महिलाओं को इससे अधिक प्रतिनिधित्व दिए जाने की वकालत की, ताकि समाज में उनकी नेतृत्व और निर्णय क्षमता का दायरा बढ़ सके। भारतीय दृष्टिकोण को उचित स्थान देने की आवश्यकता प्रो. सिंह ने भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापकता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इसमें वेद-पुराण के साथ-साथ जनजातीय समाज का अनुभवजन्य ज्ञान भी शामिल है, जिसे समझना और अपनाना समय की मांग है।वरिष्ठ पत्रकार मनोज राजन त्रिपाठी और अन्य वक्ताओं ने इतिहास और समाजशास्त्र में भारतीय दृष्टिकोण को उचित स्थान देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के विचारकों को मंच मिलना चाहिए, ताकि भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक स्तर पर पहचान मिल सके। उद्यमिता के बढ़ते प्रभाव को सकारात्मक बदलाव का संकेत गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज, आजमगढ़ के रजिस्ट्रार डॉ. अम्बरीश ने कहा कि महिलाएं आज खेल, अर्थव्यवस्था और राजनीति सहित हर क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। उन्होंने महिला उद्यमिता के बढ़ते प्रभाव को सकारात्मक बदलाव का संकेत बताया। तकनीकी सत्र में स्टार्टअप इनक्यूबेशन मेंटर डॉ. नवनीत कुमार शुक्ला ने महिलाओं से सरकारी योजनाओं और उद्यमिता नीतियों का पूरा लाभ उठाने की अपील की। उन्होंने कहा कि इससे उनकी नेतृत्व क्षमता बढ़ेगी और देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।समापन सत्र में भाषा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजय तनेजा और एमएलसी ई. अवनीश कुमार सिंह ने कार्यक्रम को सार्थक बताया।
भारतीय प्रबंध संस्थान (आईआईएम) लखनऊ में 'निर्णय, नेतृत्व, निर्माण: नारी 2047' विषय पर दो दिवसीय विचार-मंथन संपन्न हो गया। लोकनीति भारत और आईआईएम लखनऊ के सहयोग में आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य विकसित भारत 2047 के लक्ष्य में महिलाओं की भूमिका पर चर्चा करना था। विचार-मंथन के दौरान वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि केवल नीतियां बनाने से बदलाव नहीं आएगा, बल्कि जमीनी स्तर पर महिलाओं की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. संजय सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि 33% आरक्षण पर्याप्त नहीं है। उन्होंने महिलाओं को इससे अधिक प्रतिनिधित्व दिए जाने की वकालत की, ताकि समाज में उनकी नेतृत्व और निर्णय क्षमता का दायरा बढ़ सके। भारतीय दृष्टिकोण को उचित स्थान देने की आवश्यकता प्रो. सिंह ने भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापकता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इसमें वेद-पुराण के साथ-साथ जनजातीय समाज का अनुभवजन्य ज्ञान भी शामिल है, जिसे समझना और अपनाना समय की मांग है।वरिष्ठ पत्रकार मनोज राजन त्रिपाठी और अन्य वक्ताओं ने इतिहास और समाजशास्त्र में भारतीय दृष्टिकोण को उचित स्थान देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के विचारकों को मंच मिलना चाहिए, ताकि भारतीय ज्ञान परंपरा को वैश्विक स्तर पर पहचान मिल सके। उद्यमिता के बढ़ते प्रभाव को सकारात्मक बदलाव का संकेत गवर्नमेंट इंजीनियरिंग कॉलेज, आजमगढ़ के रजिस्ट्रार डॉ. अम्बरीश ने कहा कि महिलाएं आज खेल, अर्थव्यवस्था और राजनीति सहित हर क्षेत्र में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। उन्होंने महिला उद्यमिता के बढ़ते प्रभाव को सकारात्मक बदलाव का संकेत बताया। तकनीकी सत्र में स्टार्टअप इनक्यूबेशन मेंटर डॉ. नवनीत कुमार शुक्ला ने महिलाओं से सरकारी योजनाओं और उद्यमिता नीतियों का पूरा लाभ उठाने की अपील की। उन्होंने कहा कि इससे उनकी नेतृत्व क्षमता बढ़ेगी और देश की अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।समापन सत्र में भाषा विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजय तनेजा और एमएलसी ई. अवनीश कुमार सिंह ने कार्यक्रम को सार्थक बताया।