ट्रंप कौन होता है भारत को रूस से तेल खरीदने की ‘इजाजत’ देने वाला?

यह नारा सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, लेकिन अब यह सिर्फ एक ट्रोल नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई का प्रतीक बन गया है। क्या भारतीय विदेश नीति की कभी इतनी दुर्दशा हुई थी? दो घटनाएं एक साथ सामने आई हैं, जो न सिर्फ राष्ट्रीय स्वाभिमान को चोट पहुंचा रही ...

Mar 6, 2026 - 15:02
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ट्रंप कौन होता है भारत को रूस से तेल खरीदने की ‘इजाजत’ देने वाला?

Donald Trump Statement
दहाड़ते थे जो मंचों से, हम झुकने वाले वीर नहीं,

आज उन्हीं की तकदीरों में, अपनी कोई लकीर नहीं। 

 

यह नारा सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, लेकिन अब यह सिर्फ एक ट्रोल नहीं, बल्कि एक कड़वी सच्चाई का प्रतीक बन गया है। क्या भारतीय विदेश नीति की कभी इतनी दुर्दशा हुई थी? दो घटनाएं एक साथ सामने आई हैं, जो न सिर्फ राष्ट्रीय स्वाभिमान को चोट पहुंचा रही हैं, बल्कि सवाल खड़ा कर रही हैं – क्या हम अब अपनी समुद्री सीमा, अपनी ऊर्जा सुरक्षा और अपने रणनीतिक फैसलों पर भी अमेरिका की ‘मंजूरी’ लेते हैं? 

  • ये ट्रंप कौन होता है भारत को रूस से तेल खरीदने की इजाजत देने वाला! मोदी सरकार को इस पर जवाब देना होगा। 
  • हिंद महासागर में ईरानी ‘मेहमान’ जहाज डुबाकर क्या संदेश दिया ट्रंप ने, क्या हमारी समुद्री सीमा अब अमेरिका की मर्जी पर है?

पहली घटना : फरवरी 2026 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस से तेल आयात बंद करने का वादा किया है। इसके बदले अमेरिका ने भारत पर लगाए टैरिफ घटा दिए। ट्रंप ने खुलकर कहा – “भारत अब अमेरिकी तेल खरीदेगा, शायद वेनेजुएला का भी।” भारत की ओर से कोई साफ इनकार नहीं आया। सरकार चुप है। विपक्ष पूछ रहा है – क्या हमारी अर्थव्यवस्था अब ट्रंप की मर्जी पर चलती है? रूस से सस्ता तेल मिलने से भारत की अर्थव्यवस्था को कितना फायदा हुआ, यह किसी से छिपा नहीं है। यूक्रेन युद्ध के बाद भारत ने रूसी तेल खरीदकर मुद्रास्फीति पर काबू पाया, लेकिन अब ट्रंप की ‘इजाजत’ के बिना एक बूंद भी नहीं? 

 

दूसरी और ज्यादा चिंताजनक घटना : मार्च 2026 की शुरुआत में हिंद महासागर में अमेरिकी परमाणु पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत IRIS Dena को टॉरपीडो से डुबो दिया। यह जहाज भारत की मेजबानी में हुए MILAN 2026 बहुराष्ट्रीय नौसेना अभ्यास से लौट रहा था। विशाखापत्तनम में भारतीय नौसेना के साथ अभ्यास पूरा करके, सेल्फी खिंचवाकर, परेड में शामिल होकर यह जहाज घर जा रहा था – निहत्था, अंतरराष्ट्रीय जल में। इस जहाज पर श्रीलंका तट से मात्र 44 नॉटिकल मील दूर अमेरिकी पनडुब्बी ने हमला कर दिया। 87 ईरानी नाविक मारे गए। अमेरिकी रक्षा सचिव पेटे हेगसेथ ने खुलकर कहा – “वह जहाज समझ रहा था कि अंतरराष्ट्रीय जल में सुरक्षित है, लेकिन टॉरपीडो ने उसे चुपचाप समुद्र में उतार दिया।” 

 

ईरान ने इसे “भारत का मेहमान” बताया। लेकिन भारत? हमारी नौसेना ने रेस्क्यू में मदद जरूर की, लेकिन क्या हम अपने 'मेहमान' की रक्षा नहीं कर सके? यही वह हिंद महासागर है जहां अंडमान-निकोबार कमांड (ANC) को खास तौर पर स्थापित किया गया था। 2001 में बनी यह त्रि-सेवा कमांड हिंद महासागर में भारत के दबदबे के लिए बनाई गई थी – मलक्का जलडमरूमध्य की निगरानी, किसी भी विदेशी नौसेना की गतिविधि का पता लगाना और प्रभावी जवाबी कार्रवाई करना। यह कमांड भारत को हिंद महासागर का ‘गार्जियन’ बनाने का प्रतीक थी। आज उसी महासागर में अमेरिकी पनडुब्बी भारत के अभ्यास से लौटे जहाज को डुबो रही है – और हम चुप हैं?

 

सवाल उठता है – क्या हमारी रणनीतिक स्वायत्तता सिर्फ भाषणों तक सीमित रह गई है? मोदी सरकार ने ‘एक्ट ईस्ट’, ‘क्वाड’, ‘इंडो-पैसिफिक’ की बड़ी-बड़ी बातें कीं। लेकिन जब अमेरिका हिंद महासागर को अपना पिछवाड़ा मानकर ईरान पर हमला कर रहा है, तो भारत की क्या भूमिका है? रूस और ईरान हमारे पुराने साझेदार हैं। रूस से तेल, ईरान से चाबहार पोर्ट – ये हमारे राष्ट्रीय हित हैं। क्या ट्रंप के दबाव में हम इन सबको कुर्बान कर रहे हैं? क्या ‘आत्मनिर्भर भारत’ का मतलब अब सिर्फ अमेरिकी तेल खरीदना और चीन के खिलाफ QUAD में शामिल होना है?

 

यह घटना सिर्फ एक जहाज डुबाने की नहीं है। यह संदेश है – हिंद महासागर अब भारत का नहीं, बल्कि अमेरिका के खेल का मैदान है। अंडमान-निकोबार कमांड जहां किसी भी विदेशी उपस्थिति को चुनौती देने के लिए बनी थी, वहां आज अमेरिकी पनडुब्बी बिना पूछे घूम रही है। चीन पहले से ही हिंद महासागर में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहा है। अगर हम अपनी ही सीमा में अपने मेहमान को नहीं बचा सके, तो भविष्य में हम अपनी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करेंगे?

 

मोदी सरकार को जवाब देना होगा। संसद में, जनता के सामने, इतिहास के सामने। क्या हमने राष्ट्रीय हितों को व्यापारिक सौदों के लिए बेच दिया? क्या हमारी विदेश नीति अब ‘ट्रंप डिप्लोमेसी’ का गुलाम बन गई है? समय आ गया है सोचने का – अगर हम आज झुक गए, तो कल हमारी संप्रभुता कहां होगी? 

 

भारत को फिर से वह ‘वीर’ बनना होगा जो मंचों से दहाड़ता था – न झुकने वाला, न किसी की इजाजत लेने वाला। वरना इतिहास सिर्फ एक सवाल पूछेगा – “ये ट्रंप कौन होता था, भारत की तकदीर तय करने वाला?”