मुद्रा बाजार में गुरुवार को उतार-चढ़ाव भरा दिन देखने को मिला और भारतीय रुपया कारोबार के दौरान रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। हालांकि दिन के अंत में इसमें कुछ सुधार दर्ज किया गया है।
मौजूद जानकारी के अनुसार डॉलर के मुकाबले रुपया 16 पैसे की गिरावट के साथ लगभग 92.17 के स्तर पर बंद हुआ है। कारोबार की शुरुआत में रुपया करीब 92.25 के स्तर पर खुला था, लेकिन बाद में दबाव बढ़ने के कारण यह फिसलकर लगभग 92.36 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया।
गौरतलब है कि इससे पहले भी कुछ दिन पहले रुपया लगभग 92.35 के स्तर तक पहुंच चुका था, जो उस समय का सबसे निचला स्तर माना गया था। हालांकि दिन के अंत में कुछ खरीदारी के कारण रुपये ने थोड़ी रिकवरी दिखाई है।
बाजार विशेषज्ञों के अनुसार रुपये पर दबाव बनने की मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और पश्चिम एशिया में बढ़ता सैन्य तनाव माना जा रहा है। तेल की कीमतों में उछाल का असर भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों की मुद्रा पर सीधा पड़ता है।
इसके अलावा घरेलू शेयर बाजार में गिरावट और विदेशी निवेशकों की निकासी ने भी रुपये को कमजोर किया है। बता दें कि विदेशी संस्थागत निवेशकों ने हाल के दिनों में भारतीय शेयर बाजार से बड़ी मात्रा में निवेश निकाला है, जिससे मुद्रा बाजार पर अतिरिक्त दबाव बना है।
मौजूद आंकड़ों के अनुसार विदेशी निवेशकों ने एक ही दिन में लगभग 6 हजार करोड़ रुपये से अधिक के शेयरों की शुद्ध बिक्री की है। इससे निवेशकों के बीच जोखिम को लेकर सतर्कता बढ़ी है। गौरतलब है कि वैश्विक बाजार में अमेरिकी मुद्रा भी मजबूत बनी हुई है। विभिन्न प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती को मापने वाला सूचकांक भी बढ़त के साथ कारोबार करता देखा गया है।
वहीं अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखा गया है। वैश्विक मानक माने जाने वाले कच्चे तेल की कीमत वायदा कारोबार में लगभग 97 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि मध्य पूर्व में जारी तनाव लंबे समय तक बना रहता है और तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है तो आने वाले समय में रुपये पर दबाव और बढ़ सकता है।
हालांकि बाजार में यह भी चर्चा रही कि केंद्रीय बैंक की ओर से हस्तक्षेप के कारण रुपये को कुछ सहारा मिला, जिसके चलते दिन के अंत में इसमें आंशिक सुधार देखने को मिला है। आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार आने वाले दिनों में वैश्विक बाजार की स्थिति, तेल की कीमतों और विदेशी निवेश के रुझान पर रुपये की दिशा काफी हद तक निर्भर कर सकती है।