सुखबीर बादल की PM मोदी से मीटिंग, 7वें दिन हमला:क्या गठजोड़ की संभावना से डरे कट्टरपंथी; पंथक वोट बैंक का डर, एक्सपर्ट्स से जानिए
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 7 अगस्त को शिरोमणि अकाली दल (SAD) के प्रधान सुखबीर बादल ने मुलाकात की थी। जिसके बाद दोनों दलों के बीच पंजाब में 2027 चुनाव के लिए गठबंधन की अटकलें थी। इसके ठीक 6 दिन बाद (13 अगस्त को) महाराष्ट्र के नांदेड में गुरुद्वारा माता साहिब में निहंग ने उन पर हमला कर दिया। जिसमें सुखबीर के हाथ में कृपाण लगी। निहंग के किए इस हमले में सुखबीर के हाथ में कट लगा और 7-8 टांके लगे हुए हैं। पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का मानना है कि सुखबीर बादल से कट्टरपंथी लोग राम रहीम केस और बेअदबी के मुद्दों को लेकर नाराज हैं। कट्टरपंथियों की नई फेवरेट पार्टी जेल में बंद खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल की अकाली दल (वारिस पंजाब दे) है। ऐसे में अगर अकाली दल और BJP का गठबंधन होता है तो इससे कट्टरपंथियों को झटका लगेगा क्योंकि हिंदू भाजपा और आम सिख अकाली दल की तरफ झुक सकता है। ऐसे में कट्टरपंथियों को डर है कि कहीं ये गठजोड़ पहले की तरह सत्ता का ट्रंप कार्ड साबित न हो जाए। सुखबीर बादल पर हमले के ये 3 राजनीतिक मायने 1. पंथक वोट किसके साथ जाएगा, इस पर बढ़ेगी राजनीतिक जंग
सुखबीर बादल पर हमले ने पंजाब की पंथक राजनीति को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। SAD के सामने चुनौती सिर्फ अपने पारंपरिक वोट बैंक को बचाने की नहीं, बल्कि उस पंथक स्पेस को बनाए रखने की भी है, जिसमें अब नए राजनीतिक विकल्प मौजूद हैं। पिछली बार पंथक वोट का एक बड़ा हिस्सा SAD से खिसककर AAP की ओर गया था। इस बार अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के रूप में एक और विकल्प सामने है। ऐसे में आने वाले चुनाव में पंथक वोट का बंटवारा किस तरह होता है, यह SAD के लिए अहम होगा। 2. सुखबीर की BJP से नजदीकी पंथक राजनीति में नई चुनौती बन सकती है
सुखबीर बादल की PM मोदी से हालिया मुलाकात के बाद BJP और SAD के संभावित गठबंधन की चर्चाएं तेज हुई हैं। अकाली दल के लिए यह राजनीतिक रूप से फायदे का समीकरण हो सकता है, लेकिन पंथक राजनीति के लिहाज से इसमें जोखिम भी है। SAD पहले BJP के साथ गठबंधन सरकार चला चुका है। उस दौर में पार्टी ने विकास और हिंदू-सिख एकता को प्राथमिकता दी थी, जबकि बाद में बेअदबी और कृषि कानून जैसे मुद्दों ने उसके सामने राजनीतिक संकट खड़ा किया। अब अगर BJP-SAD गठबंधन की दिशा में दोबारा बढ़ते हैं, तो SAD को अपने पंथक आधार और गठबंधन की राजनीति के बीच संतुलन बनाना होगा। 3. पुराने मुद्दे चुनावी नैरेटिव का हिस्सा बन सकते हैं
बेअदबी मामले, 2015 के गोलीकांड और डेरा विवाद जैसे मुद्दे सुखबीर बादल और SAD की राजनीति से लंबे समय से जुड़े रहे हैं। हमले के बाद विपक्षी दल इन घटनाओं को फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में ला सकते हैं। इसका मकसद केवल हमले की राजनीतिक व्याख्या करना नहीं, बल्कि सिख मतदाताओं के बीच SAD को लेकर पुरानी नाराजगी को दोबारा सक्रिय करना भी हो सकता है। चुनावी माहौल में इन मुद्दों की वापसी SAD के लिए सीधी चुनौती बन सकती है। पॉलिटिकल एक्सपर्ट ने क्या कहा, जानिए… पंथक वोट एकजुट हुआ तो SAD को फायदा
राजनीतिक विशेषज्ञ प्रो. डॉ. केके रत्तू के मुताबिक, सुखबीर बादल के खिलाफ विरोध के बावजूद अगर पंथक वोट उनके पक्ष में एकजुट होता है तो इसका सीधा फायदा SAD को विधानसभा चुनाव में मिल सकता है। उनके मुताबिक, प्रकाश सिंह बादल के दौर में हिंदू-सिख एकता को बनाए रखना SAD की बड़ी राजनीतिक उपलब्धि रही थी। इसलिए सुखबीर बादल पर हमला केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि पंजाब की राजनीति में गंभीर संकेत है। हालांकि, पंथक वोट के सामने इस बार नए विकल्प मौजूद होने से SAD की चुनौती भी बढ़ गई है। पुरानी नाराजगी को फिर हवा मिल सकती है
सीनियर जर्नलिस्ट और पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रमोद बातिश का कहना है कि सुखबीर बादल लगातार पार्टी को मजबूत करने और अपने कैडर तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उनकी PM मोदी से मुलाकात को लेकर अलग तरह का नैरेटिव भी बनाया जा रहा है। कट्टरपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों के बीच यह धारणा पैदा करने की कोशिश हो रही है कि सुखबीर बादल दोबारा BJP के करीब जा रहे हैं। ऐसे में पुराने मुद्दों के साथ उनकी BJP से नजदीकी को जोड़कर पंथक मतदाताओं को उनसे दूर करने की कोशिश हो सकती है। गठबंधन रोकने के लिए दबाव बनाने की कोशिश
राजनीतिक विशेषज्ञ पवनदीप शर्मा के मुताबिक, सुखबीर बादल के प्रति कुछ कट्टरपंथी संगठनों में पहले से विरोध रहा है। PM मोदी से मुलाकात के बाद BJP-SAD गठबंधन की चर्चाओं ने इस विरोध को एक नया राजनीतिक संदर्भ दे दिया है। उनका मानना है कि हमले के पीछे सुखबीर बादल को डराने या उन पर दबाव बनाने की कोशिश का पहलू भी हो सकता है, ताकि वह BJP के साथ दोबारा गठबंधन की दिशा में आगे न बढ़ें। ऐसे में यह घटना पंजाब की गठबंधन राजनीति पर भी असर डाल सकती है। पंथ सुखबीर बादल व SAD के खिलाफ क्यों है, जानिए…
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से 7 अगस्त को शिरोमणि अकाली दल (SAD) के प्रधान सुखबीर बादल ने मुलाकात की थी। जिसके बाद दोनों दलों के बीच पंजाब में 2027 चुनाव के लिए गठबंधन की अटकलें थी। इसके ठीक 6 दिन बाद (13 अगस्त को) महाराष्ट्र के नांदेड में गुरुद्वारा माता साहिब में निहंग ने उन पर हमला कर दिया। जिसमें सुखबीर के हाथ में कृपाण लगी। निहंग के किए इस हमले में सुखबीर के हाथ में कट लगा और 7-8 टांके लगे हुए हैं। पॉलिटिकल एक्सपर्ट्स का मानना है कि सुखबीर बादल से कट्टरपंथी लोग राम रहीम केस और बेअदबी के मुद्दों को लेकर नाराज हैं। कट्टरपंथियों की नई फेवरेट पार्टी जेल में बंद खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल की अकाली दल (वारिस पंजाब दे) है। ऐसे में अगर अकाली दल और BJP का गठबंधन होता है तो इससे कट्टरपंथियों को झटका लगेगा क्योंकि हिंदू भाजपा और आम सिख अकाली दल की तरफ झुक सकता है। ऐसे में कट्टरपंथियों को डर है कि कहीं ये गठजोड़ पहले की तरह सत्ता का ट्रंप कार्ड साबित न हो जाए। सुखबीर बादल पर हमले के ये 3 राजनीतिक मायने 1. पंथक वोट किसके साथ जाएगा, इस पर बढ़ेगी राजनीतिक जंग
सुखबीर बादल पर हमले ने पंजाब की पंथक राजनीति को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है। SAD के सामने चुनौती सिर्फ अपने पारंपरिक वोट बैंक को बचाने की नहीं, बल्कि उस पंथक स्पेस को बनाए रखने की भी है, जिसमें अब नए राजनीतिक विकल्प मौजूद हैं। पिछली बार पंथक वोट का एक बड़ा हिस्सा SAD से खिसककर AAP की ओर गया था। इस बार अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के रूप में एक और विकल्प सामने है। ऐसे में आने वाले चुनाव में पंथक वोट का बंटवारा किस तरह होता है, यह SAD के लिए अहम होगा। 2. सुखबीर की BJP से नजदीकी पंथक राजनीति में नई चुनौती बन सकती है
सुखबीर बादल की PM मोदी से हालिया मुलाकात के बाद BJP और SAD के संभावित गठबंधन की चर्चाएं तेज हुई हैं। अकाली दल के लिए यह राजनीतिक रूप से फायदे का समीकरण हो सकता है, लेकिन पंथक राजनीति के लिहाज से इसमें जोखिम भी है। SAD पहले BJP के साथ गठबंधन सरकार चला चुका है। उस दौर में पार्टी ने विकास और हिंदू-सिख एकता को प्राथमिकता दी थी, जबकि बाद में बेअदबी और कृषि कानून जैसे मुद्दों ने उसके सामने राजनीतिक संकट खड़ा किया। अब अगर BJP-SAD गठबंधन की दिशा में दोबारा बढ़ते हैं, तो SAD को अपने पंथक आधार और गठबंधन की राजनीति के बीच संतुलन बनाना होगा। 3. पुराने मुद्दे चुनावी नैरेटिव का हिस्सा बन सकते हैं
बेअदबी मामले, 2015 के गोलीकांड और डेरा विवाद जैसे मुद्दे सुखबीर बादल और SAD की राजनीति से लंबे समय से जुड़े रहे हैं। हमले के बाद विपक्षी दल इन घटनाओं को फिर से राजनीतिक बहस के केंद्र में ला सकते हैं। इसका मकसद केवल हमले की राजनीतिक व्याख्या करना नहीं, बल्कि सिख मतदाताओं के बीच SAD को लेकर पुरानी नाराजगी को दोबारा सक्रिय करना भी हो सकता है। चुनावी माहौल में इन मुद्दों की वापसी SAD के लिए सीधी चुनौती बन सकती है। पॉलिटिकल एक्सपर्ट ने क्या कहा, जानिए… पंथक वोट एकजुट हुआ तो SAD को फायदा
राजनीतिक विशेषज्ञ प्रो. डॉ. केके रत्तू के मुताबिक, सुखबीर बादल के खिलाफ विरोध के बावजूद अगर पंथक वोट उनके पक्ष में एकजुट होता है तो इसका सीधा फायदा SAD को विधानसभा चुनाव में मिल सकता है। उनके मुताबिक, प्रकाश सिंह बादल के दौर में हिंदू-सिख एकता को बनाए रखना SAD की बड़ी राजनीतिक उपलब्धि रही थी। इसलिए सुखबीर बादल पर हमला केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि पंजाब की राजनीति में गंभीर संकेत है। हालांकि, पंथक वोट के सामने इस बार नए विकल्प मौजूद होने से SAD की चुनौती भी बढ़ गई है। पुरानी नाराजगी को फिर हवा मिल सकती है
सीनियर जर्नलिस्ट और पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रमोद बातिश का कहना है कि सुखबीर बादल लगातार पार्टी को मजबूत करने और अपने कैडर तक पहुंच बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन उनकी PM मोदी से मुलाकात को लेकर अलग तरह का नैरेटिव भी बनाया जा रहा है। कट्टरपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों के बीच यह धारणा पैदा करने की कोशिश हो रही है कि सुखबीर बादल दोबारा BJP के करीब जा रहे हैं। ऐसे में पुराने मुद्दों के साथ उनकी BJP से नजदीकी को जोड़कर पंथक मतदाताओं को उनसे दूर करने की कोशिश हो सकती है। गठबंधन रोकने के लिए दबाव बनाने की कोशिश
राजनीतिक विशेषज्ञ पवनदीप शर्मा के मुताबिक, सुखबीर बादल के प्रति कुछ कट्टरपंथी संगठनों में पहले से विरोध रहा है। PM मोदी से मुलाकात के बाद BJP-SAD गठबंधन की चर्चाओं ने इस विरोध को एक नया राजनीतिक संदर्भ दे दिया है। उनका मानना है कि हमले के पीछे सुखबीर बादल को डराने या उन पर दबाव बनाने की कोशिश का पहलू भी हो सकता है, ताकि वह BJP के साथ दोबारा गठबंधन की दिशा में आगे न बढ़ें। ऐसे में यह घटना पंजाब की गठबंधन राजनीति पर भी असर डाल सकती है। पंथ सुखबीर बादल व SAD के खिलाफ क्यों है, जानिए…