सुप्रीम कोर्ट बोला-हर स्कूल में लड़कियों को सैनेटरी पैड मिले:लड़के-लड़कियों के अलग टॉयलेट हों; नियम का उल्लंघन करने पर स्कूल की मान्यता रद्द होगी

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को देश के सभी प्राइवेट और सरकारी स्कूलों को निर्देश दिया कि हर स्कूल में लड़कियों को फ्री में सैनेटरी पैड बांटना अनिवार्य होगा। लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग वॉशरूम बनाने होंगे। जो स्कूल ऐसा नहीं कर पाएंगे उनकी मान्यता रद्द की जाएगी। इसके साथ ही कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि हर स्कूल में दिव्यांग-अनुकूल (डिसेबल-फ्रेंडली) टॉयलेट बनाए जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में लगाई एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया है। याचिका जया ठाकुर ने लगाई थी। उनकी मांग थी कि केंद्र सरकार की मासिक धर्म स्वच्छता नीति (Menstrual Hygiene Policy) को पूरे देश में लागू किया जाए। कोर्ट के 2 सवाल… कोर्ट ने कहा- लड़कियों के शरीर को बोझ के रूप में देखा जाता है यह आदेश सिर्फ कानूनी व्यवस्था से जुड़े लोगों के लिए नहीं है। यह उन क्लासरूम के लिए भी है, जहां लड़कियां मदद मांगने में झिझकती हैं। यह उन टीचर्स के लिए है, जो मदद करना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण बंधे हुए हैं। यह उन माता-पिता के लिए भी है, जो शायद यह नहीं समझ पाते कि उनकी चुप्पी का क्या असर पड़ता है। यह समाज के लिए भी है, ताकि प्रगति का पैमाना इस बात से तय हो कि हम अपने सबसे कमजोर वर्ग की कितनी सुरक्षा करते हैं। हम हर उस बच्ची तक यह संदेश पहुंचाना चाहते हैं, जो स्कूल में अबसेंट होने की शिकार बनी, क्योंकि उसके शरीर को बोझ की तरह देखा गया जबकि इसमें उसकी कोई गलती नहीं है।

Jan 30, 2026 - 15:18
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सुप्रीम कोर्ट बोला-हर स्कूल में लड़कियों को सैनेटरी पैड मिले:लड़के-लड़कियों के अलग टॉयलेट हों; नियम का उल्लंघन करने पर स्कूल की मान्यता रद्द होगी
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को देश के सभी प्राइवेट और सरकारी स्कूलों को निर्देश दिया कि हर स्कूल में लड़कियों को फ्री में सैनेटरी पैड बांटना अनिवार्य होगा। लड़के और लड़कियों के लिए अलग-अलग वॉशरूम बनाने होंगे। जो स्कूल ऐसा नहीं कर पाएंगे उनकी मान्यता रद्द की जाएगी। इसके साथ ही कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि हर स्कूल में दिव्यांग-अनुकूल (डिसेबल-फ्रेंडली) टॉयलेट बनाए जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने 2024 में लगाई एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया है। याचिका जया ठाकुर ने लगाई थी। उनकी मांग थी कि केंद्र सरकार की मासिक धर्म स्वच्छता नीति (Menstrual Hygiene Policy) को पूरे देश में लागू किया जाए। कोर्ट के 2 सवाल… कोर्ट ने कहा- लड़कियों के शरीर को बोझ के रूप में देखा जाता है यह आदेश सिर्फ कानूनी व्यवस्था से जुड़े लोगों के लिए नहीं है। यह उन क्लासरूम के लिए भी है, जहां लड़कियां मदद मांगने में झिझकती हैं। यह उन टीचर्स के लिए है, जो मदद करना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण बंधे हुए हैं। यह उन माता-पिता के लिए भी है, जो शायद यह नहीं समझ पाते कि उनकी चुप्पी का क्या असर पड़ता है। यह समाज के लिए भी है, ताकि प्रगति का पैमाना इस बात से तय हो कि हम अपने सबसे कमजोर वर्ग की कितनी सुरक्षा करते हैं। हम हर उस बच्ची तक यह संदेश पहुंचाना चाहते हैं, जो स्कूल में अबसेंट होने की शिकार बनी, क्योंकि उसके शरीर को बोझ की तरह देखा गया जबकि इसमें उसकी कोई गलती नहीं है।