‘इस बार वोट हाथी को, अपने पुराने साथी को', आकाश आनंद के नये नारे ने उड़ा दी UP में सारे राजनीतिक दलों की नींद

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जो लोग बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को हल्के में लेकर चल रहे थे, उन्हें अब अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। बसपा के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद चुनावी मैदान में पूरी ताकत के साथ उतर चुके हैं और उनकी सभाओं में उमड़ रही भीड़, खासकर युवाओं की मौजूदगी, पार्टी के लिए नई उम्मीद पैदा कर रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी आकाश आनंद ने बसपा की रैलियों में बड़ी भीड़ आकर्षित की थी, हालांकि इसका चुनावी परिणाम पार्टी के लिए शून्य रहा। लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे अलग होते हैं और इसी अंतर को समझते हुए आकाश आनंद इस बार बसपा के लिए जमीन तैयार करने में जुटे हैं।पिछले दिनों बसपा के भीतर हुई राजनीतिक उठापटक और संगठनात्मक चुनौतियों के बीच आकाश आनंद का यह आक्रामक अभियान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा महज एक सीट पर सिमट गई थी। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव बसपा और खुद आकाश आनंद के लिए राजनीतिक अस्तित्व तथा प्रभाव की बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।इसे भी पढ़ें: ब्राह्मण वोट बैंक के लिए योगी और अखिलेश आमने-सामने, अखिलेश के 'PD मतलब पंडित' वाले बयान ने बिछाई नई सियासी बिसातहम आपको बता दें कि सोमवार को हाथरस के सादाबाद विधानसभा क्षेत्र में पार्टी प्रत्याशी अविन शर्मा के समर्थन में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में आकाश आनंद ने योगी आदित्यनाथ सरकार पर रोजगार, शिक्षा और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर तीखे हमले किए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार से पिछले दस वर्षों के कामकाज का हिसाब मांगा जाना चाहिए। आनंद का आरोप था कि सरकार ने अपनी कमियों को छिपाने के लिए पिछले एक दशक में विज्ञापनों पर 7,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए।युवाओं के मुद्दे को केंद्र में रखते हुए उन्होंने दावा किया कि राज्य में चार लाख से अधिक सरकारी पद खाली पड़े हैं और कई प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं हुई हैं। उनका कहना था कि यदि विज्ञापन पर खर्च होने वाली रकम का इस्तेमाल परीक्षाओं और रोजगार के लिए किया जाता तो बड़ी संख्या में युवाओं को सरकारी नौकरियां मिल सकती थीं। आनंद ने रोजगार के सरकारी आंकड़ों पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सप्ताह में एक दिन नाश्ता बेचने या सड़क किनारे ठेला लगाने वाले व्यक्ति को भी रोजगार के आंकड़ों में शामिल कर दिया जाता है।शिक्षा व्यवस्था पर हमला बोलते हुए आनंद ने दावा किया कि प्रदेश में 25 हजार से अधिक सरकारी स्कूल बंद किए गए हैं। उन्होंने झांसी मेडिकल कॉलेज में शिशुओं की मौत का भी जिक्र किया और सरकार से शिक्षा तथा स्वास्थ्य व्यवस्था पर जवाब मांगा। विकास परियोजनाओं की गुणवत्ता पर भी उन्होंने सवाल उठाए। उन्होंने लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि उद्घाटन के एक महीने के भीतर ही उसके कुछ हिस्सों में सड़क धंसने लगी। साथ ही उन्होंने मायावती सरकार के कार्यकाल में बने यमुना एक्सप्रेसवे को भी उदाहरण के तौर पर सामने रखा।कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर आनंद ने अपराध और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार को घेरा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ वाली छवि पर भी उन्होंने तंज कसा और पूछा कि सरकार के दावों के बावजूद अपराध तथा महिला सुरक्षा की वास्तविक स्थिति क्या है।आकाश आनंद का हमला केवल भाजपा तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उन्होंने भाजपा और कांग्रेस को ‘एक ही सिक्के के दो पहलू’ करार दिया। उनका आरोप था कि कांग्रेस संविधान और डॉ. भीमराव आंबेडकर की विचारधारा की बात करती है, लेकिन जिन राज्यों में वह सत्ता में है, वहां भी कई मामलों में वही नीतियां अपनाती है जिनके लिए वह भाजपा पर हमला करती है।समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव भी उनके निशाने पर रहे। आनंद ने सपा के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि यह फॉर्मूला बदलता रहता है। उन्होंने अखिलेश यादव और राहुल गांधी को ‘अंकल’ कहकर सभा में माहौल भी हल्का किया। अखिलेश को लेकर उन्होंने कहा कि वह 30 साल के हैं जबकि अखिलेश 50 के, इसलिए उन्हें ‘भैया’ नहीं बल्कि ‘अंकल’ कहना स्वाभाविक है।हालांकि आनंद के भाषण का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश युवाओं और सत्ता परिवर्तन को लेकर था। दिल्ली समेत देश के विभिन्न हिस्सों में हुए Gen Z के प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं का सड़क पर उतरना गलत नहीं है, लेकिन केवल भाषण और प्रदर्शन से व्यवस्था नहीं बदलती। उनके मुताबिक एक व्यक्ति को हटाकर दूसरे व्यक्ति को लाने से न नीति बदलती है, न प्रक्रिया और न ही अधिकारी।आनंद ने कहा कि वास्तविक बदलाव के लिए सरकार और सत्ता में बैठे लोगों को बदलना होगा। उन्होंने इस संदर्भ में कांशीराम और मायावती की राजनीति का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों नेताओं ने हमेशा बहुजन समाज को सत्ता हासिल करने और अपना भविष्य स्वयं लिखने के लिए प्रेरित किया।उन्होंने युवाओं को आरक्षण के खिलाफ बनाए जा रहे कथित प्रचार से भी सावधान किया। आनंद ने कहा कि आरक्षण गरीबी हटाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता दूर करने का संवैधानिक माध्यम है। उन्होंने अपने समर्थकों से आगामी विधानसभा चुनाव को अधिकारों की लड़ाई का अवसर मानते हुए सक्रिय होने की अपील की।इसी रणनीति के तहत आनंद ने नया नारा भी दिया, ‘इस बार वोट हाथी को, अपने पुराने साथी को’। साथ ही उन्होंने मतदाताओं से मायावती को पांचवीं बार मुख्यमंत्री बनाने की अपील की। साफ है कि बसपा इस बार चुनावी लड़ाई को केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक आधार की वापसी की लड़ाई बनाना चाहती है। आकाश आनंद की आक्रामकता और युवाओं की भीड़ ने इस लड़ाई में फिलहाल एक नई हलचल जरूर पैदा कर दी है। अब देखना यह होगा कि रैलियों में दिखाई दे रहा यह उत्साह वोटों में कितना बदलता है।-नीरज कुमार दुबे

Aug 13, 2026 - 22:21
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‘इस बार वोट हाथी को, अपने पुराने साथी को', आकाश आनंद के नये नारे ने उड़ा दी UP में सारे राजनीतिक दलों की नींद
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जो लोग बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को हल्के में लेकर चल रहे थे, उन्हें अब अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। बसपा के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद चुनावी मैदान में पूरी ताकत के साथ उतर चुके हैं और उनकी सभाओं में उमड़ रही भीड़, खासकर युवाओं की मौजूदगी, पार्टी के लिए नई उम्मीद पैदा कर रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी आकाश आनंद ने बसपा की रैलियों में बड़ी भीड़ आकर्षित की थी, हालांकि इसका चुनावी परिणाम पार्टी के लिए शून्य रहा। लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे अलग होते हैं और इसी अंतर को समझते हुए आकाश आनंद इस बार बसपा के लिए जमीन तैयार करने में जुटे हैं।

पिछले दिनों बसपा के भीतर हुई राजनीतिक उठापटक और संगठनात्मक चुनौतियों के बीच आकाश आनंद का यह आक्रामक अभियान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा महज एक सीट पर सिमट गई थी। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव बसपा और खुद आकाश आनंद के लिए राजनीतिक अस्तित्व तथा प्रभाव की बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।

इसे भी पढ़ें: ब्राह्मण वोट बैंक के लिए योगी और अखिलेश आमने-सामने, अखिलेश के 'PD मतलब पंडित' वाले बयान ने बिछाई नई सियासी बिसात

हम आपको बता दें कि सोमवार को हाथरस के सादाबाद विधानसभा क्षेत्र में पार्टी प्रत्याशी अविन शर्मा के समर्थन में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में आकाश आनंद ने योगी आदित्यनाथ सरकार पर रोजगार, शिक्षा और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर तीखे हमले किए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार से पिछले दस वर्षों के कामकाज का हिसाब मांगा जाना चाहिए। आनंद का आरोप था कि सरकार ने अपनी कमियों को छिपाने के लिए पिछले एक दशक में विज्ञापनों पर 7,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए।

युवाओं के मुद्दे को केंद्र में रखते हुए उन्होंने दावा किया कि राज्य में चार लाख से अधिक सरकारी पद खाली पड़े हैं और कई प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं हुई हैं। उनका कहना था कि यदि विज्ञापन पर खर्च होने वाली रकम का इस्तेमाल परीक्षाओं और रोजगार के लिए किया जाता तो बड़ी संख्या में युवाओं को सरकारी नौकरियां मिल सकती थीं। आनंद ने रोजगार के सरकारी आंकड़ों पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सप्ताह में एक दिन नाश्ता बेचने या सड़क किनारे ठेला लगाने वाले व्यक्ति को भी रोजगार के आंकड़ों में शामिल कर दिया जाता है।

शिक्षा व्यवस्था पर हमला बोलते हुए आनंद ने दावा किया कि प्रदेश में 25 हजार से अधिक सरकारी स्कूल बंद किए गए हैं। उन्होंने झांसी मेडिकल कॉलेज में शिशुओं की मौत का भी जिक्र किया और सरकार से शिक्षा तथा स्वास्थ्य व्यवस्था पर जवाब मांगा। विकास परियोजनाओं की गुणवत्ता पर भी उन्होंने सवाल उठाए। उन्होंने लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि उद्घाटन के एक महीने के भीतर ही उसके कुछ हिस्सों में सड़क धंसने लगी। साथ ही उन्होंने मायावती सरकार के कार्यकाल में बने यमुना एक्सप्रेसवे को भी उदाहरण के तौर पर सामने रखा।

कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर आनंद ने अपराध और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार को घेरा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ वाली छवि पर भी उन्होंने तंज कसा और पूछा कि सरकार के दावों के बावजूद अपराध तथा महिला सुरक्षा की वास्तविक स्थिति क्या है।

आकाश आनंद का हमला केवल भाजपा तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उन्होंने भाजपा और कांग्रेस को ‘एक ही सिक्के के दो पहलू’ करार दिया। उनका आरोप था कि कांग्रेस संविधान और डॉ. भीमराव आंबेडकर की विचारधारा की बात करती है, लेकिन जिन राज्यों में वह सत्ता में है, वहां भी कई मामलों में वही नीतियां अपनाती है जिनके लिए वह भाजपा पर हमला करती है।

समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव भी उनके निशाने पर रहे। आनंद ने सपा के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि यह फॉर्मूला बदलता रहता है। उन्होंने अखिलेश यादव और राहुल गांधी को ‘अंकल’ कहकर सभा में माहौल भी हल्का किया। अखिलेश को लेकर उन्होंने कहा कि वह 30 साल के हैं जबकि अखिलेश 50 के, इसलिए उन्हें ‘भैया’ नहीं बल्कि ‘अंकल’ कहना स्वाभाविक है।

हालांकि आनंद के भाषण का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश युवाओं और सत्ता परिवर्तन को लेकर था। दिल्ली समेत देश के विभिन्न हिस्सों में हुए Gen Z के प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं का सड़क पर उतरना गलत नहीं है, लेकिन केवल भाषण और प्रदर्शन से व्यवस्था नहीं बदलती। उनके मुताबिक एक व्यक्ति को हटाकर दूसरे व्यक्ति को लाने से न नीति बदलती है, न प्रक्रिया और न ही अधिकारी।

आनंद ने कहा कि वास्तविक बदलाव के लिए सरकार और सत्ता में बैठे लोगों को बदलना होगा। उन्होंने इस संदर्भ में कांशीराम और मायावती की राजनीति का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों नेताओं ने हमेशा बहुजन समाज को सत्ता हासिल करने और अपना भविष्य स्वयं लिखने के लिए प्रेरित किया।

उन्होंने युवाओं को आरक्षण के खिलाफ बनाए जा रहे कथित प्रचार से भी सावधान किया। आनंद ने कहा कि आरक्षण गरीबी हटाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता दूर करने का संवैधानिक माध्यम है। उन्होंने अपने समर्थकों से आगामी विधानसभा चुनाव को अधिकारों की लड़ाई का अवसर मानते हुए सक्रिय होने की अपील की।

इसी रणनीति के तहत आनंद ने नया नारा भी दिया, ‘इस बार वोट हाथी को, अपने पुराने साथी को’। साथ ही उन्होंने मतदाताओं से मायावती को पांचवीं बार मुख्यमंत्री बनाने की अपील की। साफ है कि बसपा इस बार चुनावी लड़ाई को केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक आधार की वापसी की लड़ाई बनाना चाहती है। आकाश आनंद की आक्रामकता और युवाओं की भीड़ ने इस लड़ाई में फिलहाल एक नई हलचल जरूर पैदा कर दी है। अब देखना यह होगा कि रैलियों में दिखाई दे रहा यह उत्साह वोटों में कितना बदलता है।

-नीरज कुमार दुबे