‘पीपल की छांव में’ किताब देगी पर्यावरण संरक्षण का संदेश:पर्यावरण दिवस पर होगी जारी ,पीपल बाबा ने 48 साल के अनुभवों को किताब में पिरोया
पर्यावरण प्रेमियों के बीच इन दिनों पीपल बाबा उर्फ स्वामी प्रेम परिवर्तन की आने वाली किताब ‘पीपल की छांव में’ को लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। यह किताब विश्व पर्यावरण दिवस पर जारी की जाएगी। मेरठ के पर्यावरण और पुस्तक प्रेमियों का मानना है कि यह किताब हरियाली और पर्यावरण संरक्षण की नई राह दिखाएगी। रविवार को किताब को लेकर एक गोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें ‘पीपल की छांव में’ पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि यह सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि प्रकृति और पेड़ों से जुड़ी जिंदगी का अनुभव है। पीपल बाबा ने करीब 48 वर्षों के अपने अनुभवों को इस किताब में समेटा है। उन्होंने जमीनी स्तर पर काम करते हुए लगभग 2.70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वनस्पतियों को पुनर्स्थापित किया और ढाई करोड़ से ज्यादा पेड़ व झाड़ियां लगाने का कार्य किया। स्वामी प्रेम परिवर्तन ने बताया कि बचपन से ही पीपल के पेड़ ने उन्हें आकर्षित किया। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा पौधारोपण, संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता में बिताया। उनका कहना है कि यह पुस्तक प्रकृति के साथ उनके लंबे सफर की कहानी है, जिसमें संघर्ष, अनुभव और सीख शामिल हैं। उन्होंने बताया कि बचपन में नानी की वजह से उन्हें उत्तराखंड के जंगलों, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क , राजाजी नेशनल पार्क, हरिद्वार, ऋषिकेश, टिहरी और नैनीताल जैसे इलाकों को करीब से देखने का मौका मिला। बाद में परिवार हिमाचल प्रदेश के डलहौजी में भी रहा। पीपल बाबा ने कहा कि कोरोना लॉकडाउन के दौरान भी वह घर की चारदीवारी में नहीं रह सके। वह पौधों को पानी देते, धूप और हवा के बीच समय बिताते थे। उनका मानना है कि प्रकृति ने इंसान को खुले आसमान के लिए बनाया है, बंद कमरों के लिए नहीं।
पर्यावरण प्रेमियों के बीच इन दिनों पीपल बाबा उर्फ स्वामी प्रेम परिवर्तन की आने वाली किताब ‘पीपल की छांव में’ को लेकर खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। यह किताब विश्व पर्यावरण दिवस पर जारी की जाएगी। मेरठ के पर्यावरण और पुस्तक प्रेमियों का मानना है कि यह किताब हरियाली और पर्यावरण संरक्षण की नई राह दिखाएगी। रविवार को किताब को लेकर एक गोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें ‘पीपल की छांव में’ पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि यह सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि प्रकृति और पेड़ों से जुड़ी जिंदगी का अनुभव है। पीपल बाबा ने करीब 48 वर्षों के अपने अनुभवों को इस किताब में समेटा है। उन्होंने जमीनी स्तर पर काम करते हुए लगभग 2.70 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में वनस्पतियों को पुनर्स्थापित किया और ढाई करोड़ से ज्यादा पेड़ व झाड़ियां लगाने का कार्य किया। स्वामी प्रेम परिवर्तन ने बताया कि बचपन से ही पीपल के पेड़ ने उन्हें आकर्षित किया। उन्होंने अपने जीवन का बड़ा हिस्सा पौधारोपण, संरक्षण और पर्यावरण जागरूकता में बिताया। उनका कहना है कि यह पुस्तक प्रकृति के साथ उनके लंबे सफर की कहानी है, जिसमें संघर्ष, अनुभव और सीख शामिल हैं। उन्होंने बताया कि बचपन में नानी की वजह से उन्हें उत्तराखंड के जंगलों, जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क , राजाजी नेशनल पार्क, हरिद्वार, ऋषिकेश, टिहरी और नैनीताल जैसे इलाकों को करीब से देखने का मौका मिला। बाद में परिवार हिमाचल प्रदेश के डलहौजी में भी रहा। पीपल बाबा ने कहा कि कोरोना लॉकडाउन के दौरान भी वह घर की चारदीवारी में नहीं रह सके। वह पौधों को पानी देते, धूप और हवा के बीच समय बिताते थे। उनका मानना है कि प्रकृति ने इंसान को खुले आसमान के लिए बनाया है, बंद कमरों के लिए नहीं।