वोट चोरी का नया संस्करण हैं ‘कैश फॉर वोट’ योजनाएं:चुनाव आयोग के दोहरे रवैए पर सवाल, चुनाव से ठीक पहले पैसे भेजना सोची-समझी चाल बन गया

भारत में पब्लिक मेमोरी बहुत अल्पकालीन होती है इसलिए यह जरूरी है कि इस लेख की शुरुआत 2017 की एक घटना से की जाए। तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जे जयललिता के निधन के कारण चेन्नई में उनकी विधानसभा सीट आरके नगर रिक्त हो गई थी जिस पर चुनाव आयोग ने उपचुनाव करवाने की घोषणा की एवं 12 अप्रैल 2017 को वोटिंग की तारीख निश्चित की। सब कुछ सामान्य गति से चल रहा था तभी चुनाव आयोग ने 9 अप्रैल को मतदान से तीन दिन पहले एक बयान जारी कर कहा कि मतदाताओं को बड़े पैमाने पर धन, उपहार, और अन्य प्रलोभनों के जरिए प्रभावित किया जा रहा है। ऐसी परिस्थितियों में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है। इस कारण मतदान स्थगित किया जाता है। इससे पूर्व 2016 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के दौरान भी अरवकुरिची और तंजावुर विधानसभा क्षेत्रों में मतदान स्थगित कर दिया था, क्योंकि वहां भी ‘कैश फॉर वोट’ की लगातार शिकायतें आ रही थीं। यहां ये गौर करने वाली बात है कि ये राशि किस-किस के पास पहुंची इसकी कोई पुख्ता जानकारी नहीं थी फिर भी चुनाव आयोग ने चुनाव की शुचिता बचाने के लिए सख्त कदम उठाए। बिहार में विधानसभा चुनाव की आचार संहिता 6 अक्टूबर को लागू हुई क्योंकि विधानसभा का 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा होना निश्चित था। इससे महज 10 दिन पहले 26 सितंबर को बिना किसी पूर्व घोषणा या कार्ययोजना के महिलाओं के खाते में 10,000 रुपए डीबीटी करने वाली महिला रोजगार योजना शुरू की गई, जिसके माध्यम से 12,500 करोड़ रुपए की एक बड़ी राशि ट्रांसफर की जानी थी। इसके बाद आचार संहिता के 3 दिन पहले 3 अक्टूबर को, फिर आचार संहिता के एक दिन बाद 7 अक्टूबर, 17 अक्टूबर, 24 अक्टूबर, 31 अक्टूबर के साथ पहले और दूसरे फेज की वोटिंग के बीच 7 नवंबर को भी महिलाओं के खातों में 10-10 हजार रुपए डाले गए, जो आचार संहिता का खुला उल्लंघन है। वहां महिलाओं को दी जाने वाली पेंशन 400 रुपए से बढ़ाकर 1100 रुपए कर खातों में भेजी गई। चुनावी समय में सरकार द्वारा उठाया गया यह लोक कल्याण नहीं, बल्कि सरकार द्वारा प्रायोजित लालच था। चुनाव आयोग को विपक्षी पार्टियों द्वारा की गईं कई शिकायतों के बावजूद ये राशि महिलाओं के खाते में पहुंची। बिहार से पहले ऐसे ही 7500-7500 रुपए की राशि महाराष्ट्र में 2.34 करोड़ महिलाओं के खातों में डाली गई जिसका परिणाम ये हुआ कि भाजपा और एनडीए के पक्ष में एकतरफा परिणाम आया। यह तरीका दिखाता है कि चुनाव से ठीक पहले पैसे भेजना अब एक सोची-समझी चुनावी चाल बन गया है। लेम डक पीरियड के दौरान चलाई गईं इन योजनाओं पर चुनाव आयोग ने कोई संज्ञान नहीं लिया। महज 7 साल के अंतराल में चुनाव आयोग की अप्रोच पूरी तरह बदल चुकी है। आरके नगर, अरवकुरिची और तंजावुर में राजनीतिक पार्टियों द्वारा पैसा बांटने की सूचना मिलने पर चुनाव स्थगित कर देने वाला चुनाव आयोग सरकार द्वारा खुले तौर पर हजारों करोड़ की राशि चुनाव के दौरान महिलाओं के खातों में डालने पर मौन रहकर एनडीए का पार्टनर इन क्राइम बन रहा है। राजस्थान में 2023 के विधानसभा चुनावों के दौरान महिलाओं को स्मार्टफोन देने वाली योजना पर रोक लगा दी गई थी, जबकि ये योजना फरवरी 2022 में आए राज्य बजट की घोषणा के अनुसार चलाई जा रही थी और करीब 30% पात्र महिलाओं को स्मार्टफोन दिए जा चुके थे। इसके साथ ही पहले से चल रहीं सामाजिक सुरक्षा पेंशन (वृद्धावस्था, विधवा एवं दिव्यांग पेंशन) घर-घर तक राशन पहुंचाने वाली अन्नपूर्णा योजना तक को भी रोक दिया गया। इसके विपरीत बिहार और महाराष्ट्र में महिलाओं के खाते में चुनाव के दौरान भी रुपए भेजे गए। इस तरह चुनिंदा तरीके से आचार संहिता का लागू होना चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाता है। एनडीए शासित राज्यों में यह योजनाएं बिना किसी पूर्व प्लानिंग के केवल राजनीतिक लाभ के लिए चलाई गईं, इसलिए केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने महाराष्ट्र के संदर्भ में बयान दिया कि महिलाओं को पैसे बांटने की योजना के बाद दूसरी किसी सब्सिडी के लिए पैसा नहीं बचता है। चुनाव आयोग हरियाणा में वोट चोरी के राहुल गांधी के खुलासे पर अभी तक कोई जवाब नहीं दे पाया है। महादेवपुरा को लेकर किए गए खुलासों पर चुनाव आयोग का जवाब संतोषजनक नहीं था। ‘कैश फॉर वोट’ की योजनाओं पर चुनाव आयोग चुप रहता है और एनडीए के पक्ष में खुले तौर पर वोट खरीदने देता है। अगर ऐसे चुनावों के दौरान खातों में सीधे रुपए डालकर ही चुनाव जीतना है तो चुनाव करवाने की औपचारिकता करवाने की क्या आवश्यकता है। भारत को अपने चुनावी सिस्टम को ऐसी दिशा में नहीं जाने देना चाहिए जहां चुनावी नतीजे जनता की पसंद की बजाय सरकारी मशीनरी तय करे यानी लोकतंत्र सिर्फ नाम का रह जाए।

Nov 23, 2025 - 12:10
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वोट चोरी का नया संस्करण हैं ‘कैश फॉर वोट’ योजनाएं:चुनाव आयोग के दोहरे रवैए पर सवाल, चुनाव से ठीक पहले पैसे भेजना सोची-समझी चाल बन गया
भारत में पब्लिक मेमोरी बहुत अल्पकालीन होती है इसलिए यह जरूरी है कि इस लेख की शुरुआत 2017 की एक घटना से की जाए। तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जे जयललिता के निधन के कारण चेन्नई में उनकी विधानसभा सीट आरके नगर रिक्त हो गई थी जिस पर चुनाव आयोग ने उपचुनाव करवाने की घोषणा की एवं 12 अप्रैल 2017 को वोटिंग की तारीख निश्चित की। सब कुछ सामान्य गति से चल रहा था तभी चुनाव आयोग ने 9 अप्रैल को मतदान से तीन दिन पहले एक बयान जारी कर कहा कि मतदाताओं को बड़े पैमाने पर धन, उपहार, और अन्य प्रलोभनों के जरिए प्रभावित किया जा रहा है। ऐसी परिस्थितियों में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है। इस कारण मतदान स्थगित किया जाता है। इससे पूर्व 2016 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों के दौरान भी अरवकुरिची और तंजावुर विधानसभा क्षेत्रों में मतदान स्थगित कर दिया था, क्योंकि वहां भी ‘कैश फॉर वोट’ की लगातार शिकायतें आ रही थीं। यहां ये गौर करने वाली बात है कि ये राशि किस-किस के पास पहुंची इसकी कोई पुख्ता जानकारी नहीं थी फिर भी चुनाव आयोग ने चुनाव की शुचिता बचाने के लिए सख्त कदम उठाए। बिहार में विधानसभा चुनाव की आचार संहिता 6 अक्टूबर को लागू हुई क्योंकि विधानसभा का 5 वर्ष का कार्यकाल पूरा होना निश्चित था। इससे महज 10 दिन पहले 26 सितंबर को बिना किसी पूर्व घोषणा या कार्ययोजना के महिलाओं के खाते में 10,000 रुपए डीबीटी करने वाली महिला रोजगार योजना शुरू की गई, जिसके माध्यम से 12,500 करोड़ रुपए की एक बड़ी राशि ट्रांसफर की जानी थी। इसके बाद आचार संहिता के 3 दिन पहले 3 अक्टूबर को, फिर आचार संहिता के एक दिन बाद 7 अक्टूबर, 17 अक्टूबर, 24 अक्टूबर, 31 अक्टूबर के साथ पहले और दूसरे फेज की वोटिंग के बीच 7 नवंबर को भी महिलाओं के खातों में 10-10 हजार रुपए डाले गए, जो आचार संहिता का खुला उल्लंघन है। वहां महिलाओं को दी जाने वाली पेंशन 400 रुपए से बढ़ाकर 1100 रुपए कर खातों में भेजी गई। चुनावी समय में सरकार द्वारा उठाया गया यह लोक कल्याण नहीं, बल्कि सरकार द्वारा प्रायोजित लालच था। चुनाव आयोग को विपक्षी पार्टियों द्वारा की गईं कई शिकायतों के बावजूद ये राशि महिलाओं के खाते में पहुंची। बिहार से पहले ऐसे ही 7500-7500 रुपए की राशि महाराष्ट्र में 2.34 करोड़ महिलाओं के खातों में डाली गई जिसका परिणाम ये हुआ कि भाजपा और एनडीए के पक्ष में एकतरफा परिणाम आया। यह तरीका दिखाता है कि चुनाव से ठीक पहले पैसे भेजना अब एक सोची-समझी चुनावी चाल बन गया है। लेम डक पीरियड के दौरान चलाई गईं इन योजनाओं पर चुनाव आयोग ने कोई संज्ञान नहीं लिया। महज 7 साल के अंतराल में चुनाव आयोग की अप्रोच पूरी तरह बदल चुकी है। आरके नगर, अरवकुरिची और तंजावुर में राजनीतिक पार्टियों द्वारा पैसा बांटने की सूचना मिलने पर चुनाव स्थगित कर देने वाला चुनाव आयोग सरकार द्वारा खुले तौर पर हजारों करोड़ की राशि चुनाव के दौरान महिलाओं के खातों में डालने पर मौन रहकर एनडीए का पार्टनर इन क्राइम बन रहा है। राजस्थान में 2023 के विधानसभा चुनावों के दौरान महिलाओं को स्मार्टफोन देने वाली योजना पर रोक लगा दी गई थी, जबकि ये योजना फरवरी 2022 में आए राज्य बजट की घोषणा के अनुसार चलाई जा रही थी और करीब 30% पात्र महिलाओं को स्मार्टफोन दिए जा चुके थे। इसके साथ ही पहले से चल रहीं सामाजिक सुरक्षा पेंशन (वृद्धावस्था, विधवा एवं दिव्यांग पेंशन) घर-घर तक राशन पहुंचाने वाली अन्नपूर्णा योजना तक को भी रोक दिया गया। इसके विपरीत बिहार और महाराष्ट्र में महिलाओं के खाते में चुनाव के दौरान भी रुपए भेजे गए। इस तरह चुनिंदा तरीके से आचार संहिता का लागू होना चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठाता है। एनडीए शासित राज्यों में यह योजनाएं बिना किसी पूर्व प्लानिंग के केवल राजनीतिक लाभ के लिए चलाई गईं, इसलिए केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने महाराष्ट्र के संदर्भ में बयान दिया कि महिलाओं को पैसे बांटने की योजना के बाद दूसरी किसी सब्सिडी के लिए पैसा नहीं बचता है। चुनाव आयोग हरियाणा में वोट चोरी के राहुल गांधी के खुलासे पर अभी तक कोई जवाब नहीं दे पाया है। महादेवपुरा को लेकर किए गए खुलासों पर चुनाव आयोग का जवाब संतोषजनक नहीं था। ‘कैश फॉर वोट’ की योजनाओं पर चुनाव आयोग चुप रहता है और एनडीए के पक्ष में खुले तौर पर वोट खरीदने देता है। अगर ऐसे चुनावों के दौरान खातों में सीधे रुपए डालकर ही चुनाव जीतना है तो चुनाव करवाने की औपचारिकता करवाने की क्या आवश्यकता है। भारत को अपने चुनावी सिस्टम को ऐसी दिशा में नहीं जाने देना चाहिए जहां चुनावी नतीजे जनता की पसंद की बजाय सरकारी मशीनरी तय करे यानी लोकतंत्र सिर्फ नाम का रह जाए।