राज्यपाल के अभिभाषण को लेकर कर्नाटक में भी बवाल, गहलोत ने पढ़ने से किया इंकार
Karnataka Governor Controversy: तमिलनाडु और केरल के बाद गैर भाजपा शासित राज्य कर्नाटक में भी राज्यपाल के अभिभाषण को लेकर सियासत गरमा गई है। राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने विधानसभा सत्र में पूरा अभिभाषण पढ़ने से इंकार कर दिया है।
Karnataka Governor Controversy: तमिलनाडु और केरल के बाद गैर भाजपा शासित राज्य कर्नाटक में भी राज्यपाल के अभिभाषण को लेकर सियासत गरमा गई है। राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने विधानसभा सत्र में पूरा अभिभाषण पढ़ने से इंकार कर दिया है। कर्नाटक सरकार ने अभिभाषण में केंद्र सरकार पर टैक्स और फंड के बंटवारे में भेदभाव करने का आरोप लगाया था। राज्यपाल ने उन्हें आपत्तिजनक लग रहे 11 पैराग्राफ्स पढ़ने से साफ मना कर दिया।
क्या है कर्नाटक का विवाद?
साल 2026 के पहले विधानसभा सत्र में राज्यपाल ने कैबिनेट द्वारा तैयार अभिभाषण की केवल तीन लाइनें पढ़ीं और बाकी 11 पैराग्राफ पढ़ने से इनकार कर दिया। सरकार ने राज्यपाल के अभिभाषण में केंद्र की टैक्स नीतियों और VB-G RAM G (विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन) कानून की तीखी आलोचना की थी। राज्यपाल गहलोत ने इसे 'सरकारी प्रोपेगेंडा' बताया और कहा कि संवैधानिक पद पर रहते हुए वे संसद द्वारा पारित कानूनों के खिलाफ नहीं बोल सकते।
तनातनी का नया केंद्र दक्षिण भारत
यह केवल कर्नाटक की कहानी नहीं है। गैर-भाजपा शासित राज्यों में राज्यपाल और मुख्यमंत्रियों के बीच 'अभिभाषण' को लेकर अन्य राज्यों में भी तनातनी जारी है। इससे पहले हाल ही में तमिलनाडु में 'द्रविड़ मॉडल' शब्द पर आपत्ति जताते हुए राज्यपाल आरएन रवि ने वॉकआउट किया। सदन ने मूल भाषण को रिकॉर्ड में रखने का रेजोल्यूशन पास किया। केरल में भी राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने भाषण के आलोचनात्मक हिस्सों को पढ़ने से मना कर दिया। दूसरी ओर, दिल्ली में केजरीवाल की आम आदमी पार्टी सरकार के कार्यकाल में उपराज्यपाल के साथ रोज विवाद होता था, हालांकि अब भाजपा सरकार आने के बाद विवाद थम गया है।
क्या कहता है कानून?
संविधान विशेषज्ञों की मानें तो राज्यपाल का पद एक 'संवैधानिक मुखिया' का है, न कि सक्रिय राजनीतिज्ञ का।अनुच्छेद 176 (1) के तहत राज्यपाल के लिए साल के पहले सत्र में कैबिनेट द्वारा तैयार भाषण पढ़ना अनिवार्य है। यह अभिभाषण पूरी तरह राज्य कैबिनेट द्वारा तैयार किया जाता है। राज्यपाल इसमें अपनी मर्जी से कोई शब्द नहीं जोड़ सकते और न ही हटा सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख है कि राज्यपाल को कैबिनेट की 'सलाह और सहायता' पर काम करना चाहिए। भाषण सरकार की नीतियों का दर्पण होता है, राज्यपाल की व्यक्तिगत राय का नहीं। अभिभाषण पढ़ना राज्यपाल का एक संवैधानिक दायित्व है। इसे छोड़ना या इसमें बदलाव करना 'संवैधानिक परंपरा' का उल्लंघन है।
कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार और तमिलनाडु की स्टालिन सरकार इस मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाने की तैयारी में हैं, जहां अनुच्छेद 176 के उल्लंघन को चुनौती दी जा सकती है। तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने इस परंपरा को 'ब्रिटिश अवशेष' बताते हुए इसे खत्म करने या संशोधन करने की मांग की है। दूसरी ओर, विपक्षी दल एकजुट होकर इसे 'संघीय ढांचे पर हमला' बताकर केंद्र सरकार को घेर रहे हैं।
Edited by: Vrijendra Singh Jhala



