तीन मुस्लिम देश, सऊदी, कतर और ओमान ईरान के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हैं। ईरान दिन पर दिन और ताकतवर होता जा रहा है। अब लगता है कि मानो ट्रंप की धमकियां फीकी पड़ती नजर आ रही है। क्योंकि अरब के बड़े देशों ने अमेरिका को ईरान पर हमला ना करने की वार्निंग दे दी है। दरअसल, खाड़ी के इन बड़े देशों ने अमेरिका को साफ संकेत दे दिया है कि अगर ईरान पर सैन्य हमला किया गया तो उसके नतीजे सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहेंगे। इसका सबसे बड़ा नुकसान खुद अमेरिका और पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को उठाना पड़ सकता है।
सऊदी अरब ने तो यहां तक कह दिया कि अगर वाशिंगटन ईरान पर हमले की योजना बनाता है तो रियाद उसमें किसी भी तरह का सहयोग नहीं करेगा। ना तो सैन्य मदद और ना ही अपने एयर स्पेस का इस्तेमाल। यह चेतावनी ऐसे वक्त में आई है जब ट्रंप और वाइट हाउस के अधिकारी यह कह चुके हैं कि ईरान के खिलाफ सैन्य कारवाई की संभावना से पूरी तरह इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन अरब देशों का मानना है कि यह रास्ता पूरे मिडिल ईस्ट को आग में झोंक सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक सऊदी अरब, क़तर और ओमान ने वाइट हाउस को यह समझाने की कोशिश की है कि अगर ईरानी शासन को गिराने की कोशिश की गई तो उसका सीधा असर ग्लोबल ऑयल मार्केट पर पड़ेगा। तेल की कीमतें बेकाबू हो सकती हैं और अंत में इसका झटका अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ही लगेगा। हालांकि वाइट हाउस के एक अधिकारी ने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा कि ट्रंप इन चेतावनियों को गंभीरता से माने इसकी संभावना कम है।
अधिकारी के मुताबिक राष्ट्रपति हर तरह की राय सुनते जरूर हैं लेकिन फैसला वही करते हैं जो उन्हें ठीक लगता है। क़तर का मानना है कि अगर अमेरिका ने ईरान पर हमला किया तो पूरा मिडिल ईस्ट अराजकता में डूब सकता है। हालात इतने बिगड़ सकते हैं कि कोई भी देश खुद को सुरक्षित नहीं रख पाएगा। सऊदी अरब मानता है कि अगर ईरान में अस्थिरता फैलती है और उसमें उसका नाम जुड़ता है तो उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि पर सवाल उठेंगे। आरोप लग सकता है कि सऊदी हमेशा अभिव्यक्ति की आजादी दबाने वाले देशों के साथ खड़ा रहता है। इसके अलावा सऊदी को डर है कि अगर अयातुल्लाह खामनाई के बाद सत्ता का संतुलन बिगड़ता है तो ईरान की कमान पूरी तरह आईआरजीसी के हाथों में जा सकती है।
वहीं ओमान का कहना है कि ईरान पर हमला हालात सुधारने की बजाय और बिगाड़ देगा सबसे बड़ा खतरा होमोस्ट स्टेट को लेकर है। अगर जंग की स्थिति बनी तो ईरान इस अहम समुद्री रास्ते को बंद कर सकता है। ऐसा हुआ तो तेल और गैस का वैश्विक व्यापार बुरी तरह प्रभावित होगा। हॉर्नोस्ट रेट की अहमियत इसी से समझी जा सकती है कि दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का करीब 25% और लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी कि एलएनजी का लगभग 20% हिस्सा हर साल इसी रास्ते से गुजरता है। रोजाना करीब 20 मिलियन बैरल तेल इस जलडमरू मध्य से होकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचता है।