जींद के जैन संत अरुण महाराज बोले- अहंकार न करें:कहा- गलती हो तो माफी मांगें, माता-पिता का सम्मान करें

जींद के जैन संत अरुण चंद्र महाराज इन दिनों उचाना क्षेत्र में धर्म, ध्यान और अहिंसा की अलख जगा रहे हैं। शनिवार को मखंड से विहार कर सुरबरा गांव पहुंचने पर उन्होंने श्रद्धालुओं को जीवन के गूढ़ रहस्यों और नैतिक मूल्यों का बोध कराया। महाराज ने अपने प्रवचन में अहंकार के त्याग और संस्कारों के महत्व को रेखांकित किया। क्षमा और अहंकार पर उपदेश महाराज ने कहा कि "माफी मांगने वाला व्यक्ति बड़ा होता है, लेकिन जो दूसरों को माफ कर दे, वह उससे भी बड़ा होता है।" उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि यदि जीवन में कोई भूल हो जाए, तो अहंकार को त्याग कर तुरंत माफी मांग लेनी चाहिए। साथ ही, किसी की गलती पर उसे सहृदयता से माफ कर देना ही सच्ची मानवता है। जैन संतों की सादगी का उदाहरण बदलते दौर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज के आधुनिक युग में भी जैन संत अपनी प्राचीन परंपराओं और सादगी पर अडिग हैं। न पैरों में चप्पल, न बैंक में खाता और न सिर पर छाता—जैन संत निरंतर पैदल विहार कर समाज को सन्मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने भगवान महावीर के 'जियो और जीने दो' के सिद्धांत को आत्मसात करने का आह्वान किया। माता-पिता की सेवा ही परम धर्म महाराज ने विशेष रूप से युवाओं को संदेश दिया कि माता-पिता का सम्मान हर हाल में करना चाहिए। उन्होंने कहा, "माता-पिता हर किसी के भाग्य में नहीं होते; जो उनका अपमान करते हैं, वे जीवन में कभी सुख और शांति प्राप्त नहीं कर सकते।" उन्होंने कर्मों की प्रधानता पर जोर देते हुए कहा कि मृत्यु के पश्चात केवल व्यक्ति के अच्छे और बुरे कर्म ही उसके साथ जाते हैं। अगला पड़ाव निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, अरुण चंद्र महाराज रविवार को सुरबरा से विहार कर दनौदा होते हुए बिठमड़ा की ओर प्रस्थान करेंगे। इस अवसर पर वीरेंद्र करसिंधु, सुभाष कापड़ो, विकास मखंड और विजय बंसल सहित भारी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।

Jan 3, 2026 - 22:39
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जींद के जैन संत अरुण महाराज बोले- अहंकार न करें:कहा- गलती हो तो माफी मांगें, माता-पिता का सम्मान करें
जींद के जैन संत अरुण चंद्र महाराज इन दिनों उचाना क्षेत्र में धर्म, ध्यान और अहिंसा की अलख जगा रहे हैं। शनिवार को मखंड से विहार कर सुरबरा गांव पहुंचने पर उन्होंने श्रद्धालुओं को जीवन के गूढ़ रहस्यों और नैतिक मूल्यों का बोध कराया। महाराज ने अपने प्रवचन में अहंकार के त्याग और संस्कारों के महत्व को रेखांकित किया। क्षमा और अहंकार पर उपदेश महाराज ने कहा कि "माफी मांगने वाला व्यक्ति बड़ा होता है, लेकिन जो दूसरों को माफ कर दे, वह उससे भी बड़ा होता है।" उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि यदि जीवन में कोई भूल हो जाए, तो अहंकार को त्याग कर तुरंत माफी मांग लेनी चाहिए। साथ ही, किसी की गलती पर उसे सहृदयता से माफ कर देना ही सच्ची मानवता है। जैन संतों की सादगी का उदाहरण बदलते दौर का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि आज के आधुनिक युग में भी जैन संत अपनी प्राचीन परंपराओं और सादगी पर अडिग हैं। न पैरों में चप्पल, न बैंक में खाता और न सिर पर छाता—जैन संत निरंतर पैदल विहार कर समाज को सन्मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने भगवान महावीर के 'जियो और जीने दो' के सिद्धांत को आत्मसात करने का आह्वान किया। माता-पिता की सेवा ही परम धर्म महाराज ने विशेष रूप से युवाओं को संदेश दिया कि माता-पिता का सम्मान हर हाल में करना चाहिए। उन्होंने कहा, "माता-पिता हर किसी के भाग्य में नहीं होते; जो उनका अपमान करते हैं, वे जीवन में कभी सुख और शांति प्राप्त नहीं कर सकते।" उन्होंने कर्मों की प्रधानता पर जोर देते हुए कहा कि मृत्यु के पश्चात केवल व्यक्ति के अच्छे और बुरे कर्म ही उसके साथ जाते हैं। अगला पड़ाव निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, अरुण चंद्र महाराज रविवार को सुरबरा से विहार कर दनौदा होते हुए बिठमड़ा की ओर प्रस्थान करेंगे। इस अवसर पर वीरेंद्र करसिंधु, सुभाष कापड़ो, विकास मखंड और विजय बंसल सहित भारी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।