फिर से भारतीय छात्रों की पसंद क्यों बनी सिविल इंजीनियरिंग?

आईआईटी में दाखिले का मौजूदा दौर इस बदलाव की पुष्टि करता है। शिक्षाविदों का कहना है कि ऐसा नहीं है कि कंप्यूटर साइंस के प्रति छात्रों की दिलचस्पी में गिरावट आई है। यह अब भी लोकप्रिय है। लेकिन स्थापित मानदंडों के विपरीत इस साल सिविल इंजीनियरिंग भी ...

Jun 23, 2026 - 08:40
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फिर से भारतीय छात्रों की पसंद क्यों बनी सिविल इंजीनियरिंग?

IIT admission trends 2026 प्रभाकर मणि तिवारी

आईआईटी में दाखिले का मौजूदा दौर इस बदलाव की पुष्टि करता है। शिक्षाविदों का कहना है कि ऐसा नहीं है कि कंप्यूटर साइंस के प्रति छात्रों की दिलचस्पी में गिरावट आई है। यह अब भी लोकप्रिय है। लेकिन स्थापित मानदंडों के विपरीत इस साल सिविल इंजीनियरिंग भी तेजी से मेधावी छात्रों की पसंद बन कर उभरी है।

 

बीते साल तक इसकी कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। उनका कहना था कि बड़ी संख्या में पढ़ाई में तेज छात्र अब ऐसे फैसले ले रहे हैं जो पारंपरिक सोच की बजाय दूरदर्शिता पर आधारित है। ALSO READ: ब्रेक्जिट के 10 साल: ब्रिटेन को भारी पड़ा अलग होने का फैसला

 

सिविल इंजीनियरिंग की बढ़ती अहमियत

विशेषज्ञों के मुताबिक, भारतीय तकनीकी संस्थानों (आईआईटी) में कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग (सीएसई) के बाद मैथमेटिक्स एंड कंप्यूटिंग (एमएनसी) छात्रों की दूसरी सबसे पसंदीदा ब्रांच रही है। एमएनसी छात्रों में काफी लोकप्रिय है और उनको क्वांटिटेटिव ट्रेडिंग फर्म के अलावा डाटा साइंस और इन्वेस्टमेंट बैंक सेक्टर में मोटे पैकेज वाली बेहतरीन नौकरियां मिलती रही है।

 

वर्ष 2018 में आईआईटी, हैदराबाद ने पहली बार एआई में बीटेक की पढ़ाई शुरू की थी। उसके बाद बीते तीन वर्षो के दौरान पटना, खड़गपुर, मद्रास और मंडी स्थित आईआईटी में एआई और डाटा एनालिटिक्स जैसे नए कोर्स शुरू किए गए हैं। ALSO READ: भविष्य की सैन्य ताकत के लिए भारत का स्वदेशी ड्रोन पर जोर

 

खासकर आईआईटी की प्रवेश परीक्षा जेईई-एडवांस्ड में पहले सौ स्थानों पर रहने वाले छात्र तो आंख मूंद कर आईआईटी, मुंबई और दिल्ली में कंप्यूटर साइंस का कोर्स ही चुनते रहे हैं। कंप्यूटर साइंस और एआई आधारित दूसरे पाठ्यक्रमों का क्रेज अब भी कम नहीं हुआ है। इसकी वही अहमियत है जो अस्सी-नब्बे के दशक में सिविल इंजीनियरिंग की होती थी। इस साल बदलाव यह है कि सिविल इंजीनियरिंग एक बार फिर मेधावी छात्रों की प्राथमिकता सूची में तेजी से ऊपर चढ़ रही है। बीते दो दशकों के दौरान छात्र बेहद मजबूरी में या आईआईटी के ठप्पे के लिए ही इस शाखा को चुनते थे।

 

इस साल आईआईटी में दाखिले के पहले दौर से छात्रों की इस बदलती पसंद की पुष्टि होती है। आईआईटी में दाखिले के आंकड़ों को ध्यान में रखें तो बीते साल जहां प्रवेश परीक्षा में 2,666वीं रैंक वाले छात्र ने आईआईटी, बंबई में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई चुनी थी वहीं इस साल इसकी ओपनिंग रैंक 385 रही है। दिल्ली के मामले में तो यह बदलाव और स्पष्ट दिख रहा है। यहां बीते साल सिविल इंजीनियरिंग में दाखिले की ओपनिंग रैंक 3,030 थी जो इस साल तेजी से बढ़ कर 179 तक पहुंच गई है। आईआईटी, रुड़की और भुवनेश्वर समेत कई स्थानों पर यही ट्रेंड सामने आ रहा है।

 

क्या है बदलती पसंद की वजह?

शिक्षाविदों का कहना है कि बीते एक-डेढ़ दशक में कैंपस प्लेसमेंट के दौरान मिलने वाले वेतन का पैकेज ही इंजीनियररिंग की शाखाओं के चयन में सबसे अहम भूमिका निभाता रहा है। कंप्यूटर साइंस इस मामले में सबसे ऊपर रहा है। इसकी पढ़ाई करने वाले छात्रों को 20 से 50 लाख तक के पैकेज मिलते रहे हैं। इसके अलावा हर साल विभिन्न आईआईटी में एक करोड़ या उससे ऊपर के पैकेज भी सुर्खियां बटोरते रहे हैं। इसके उलट आईआईटी से सिविल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने वाले छात्रों को शुरुआत में सालाना औसतन आठ से 10 लाख तक के ही पैकेज मिलते हैं। लेकिन अब छात्र पैकेज से ऊपर उठकर करियर के स्थायित्व को ज्यादा अहमियत दे रहे हैं।

 

इस साल जेईई-एडवांस में चुनी गई कोलकाता की एक छात्रा नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू से कहती है, "मैं आईआईटी मुंबई या दिल्ली में सिविल इंजीनियरिंग लेकर पढ़ना चाहती हूं। आमतौर पर कंप्यूटर साइंस या इलेक्ट्रानिक्स जैसे विषय ही मुफीद समझे जाते हैं। लेकिन भविष्य और करियर के स्थायित्व को ध्यान में रखते हुए मैंने यह फैसला किया है। इसे घरवालों का भी समर्थन है।" ALSO READ: आखिर क्यों नहीं सुधर रही बिहार की चिकित्सा व्यवस्था

 

कोलकाता के एक निजी कालेज में सिविल इंजीनियरिंग विभाग के पूर्व प्रमुख डॉ गौतम सेन डीडब्ल्यू से कहते हैं, "पहले किसी बेहतर कालेज में कंप्यूटर साइंस की डिग्री मोटे पैकेज वाली नौकरी और बेहतर भविष्य की गारंटी मानी जाती थी। लेकिन बीते कुछ वर्षो से नौकरियों में अनिश्चितता के कारण अब छात्रों की सोच बदल रही है।"

 

एआई की बढ़ती क्षमताएं बनीं एक कारण   

कलकत्ता विश्वविद्यालय के एक कालेज में सिविल इंजीनियरिंग विभाग की सहायक प्रोफेसर अंकिता नाथ डीडब्ल्यू से कहती हैं, "सॉफ्टवेयर कंपनियों में कोडिंग, डि-बगिंग और रूटीन प्रोग्रामिंग के लिए एआई के बढ़ते इस्तेमाल ने छात्रों के सामने ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है जो कुछ साल पहले तक कोई सोच भी नहीं सकता था। स्थायी करियर की उम्मीद में ही छात्र अब सिविल इंजीनियरिंग जैसे कोर विषयों की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

 

कोलकाता के एक अन्य निजी इंजीनियरिंग कॉलेज में कंप्यूटर साइंस विभाग के प्रमुख डॉ। तीर्थंकर डीडब्ल्यू से कहते हैं, "ऐसा नहीं है कि कंप्यूटर साइंस की पढ़ाई करने वाले छात्रों को अब बेहतर नौकरियां नहीं मिल रही हैं। दिक्कत यह है कि अब ऐसी नौकरियों पर अस्थिरता और छंटनी की तलवार लटक रही है। छात्रों की पसंद में बदलाव की यह भी एक बड़ी वजह है।"

 

आईआईटी, खड़गपुर के  एक पूर्व प्रोफेसर डॉ अरुणाभ भट्टाचार्य डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हाल के दिनों में भारत समेत दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियों में बड़े पैमाने पर होने वाली छंटनियों ने छात्रों को अपनी सोच में बदलाव पर मजबूर कर दिया है। सॉफ्टवेयर उद्योग जहां एआई के बढ़ते इस्तेमाल की वजह से अनिश्चितता के दौर से गुजर रहा है वहीं देश में बड़े पैमाने पर आधारभूत परियोजनाएं शुरू होने के कारण सिविल इंजीनियरों की मांग तेजी से बढ़ने की उम्मीद है।"

 

विशेषज्ञों का कहना है कि कंप्यूटर साइंस की डिग्री वाले ज्यादातर छात्रों को कैंपस प्लेसमेंट में शुरुआती स्तर वाली कोडिंग की नौकरियां मिलती हैं। यह काम अब एआई के जरिए बेहद कम समय और खर्च में हो जाता है। ऐसे में एक दशक बाद पहली बार यह धारणा सवालों के घेरे में है कि कंप्यूटर साइंस की डिग्री सुरक्षित करियर की गारंटी है।

 

डॉ सेन के मुताबिक, छात्रों के साथ ही उनके अभिभावकों को भी लग रहा है कि शुरुआती नौकरी तो मिल जाएगी। लेकिन आगे करियर का रास्ता उतना सुरक्षित नहीं रहा जितना पहले होता था। वो अब कैंपस प्लेसमेंट में नौकरी हासिल करने की बजाय करियर के स्थायित्व और भविष्य के बारे में सोच रहे हैं। ALSO READ: क्या सीजेपी की देखादेखी युवाओं के मुद्दे उठा रही है कांग्रेस

 

बढ़ती आधारभूत परियोजनाएं

विशेषज्ञों का कहना है कि देश में बड़े पैमाने पर हाईवे से लेकर मेट्रो रेल और तमाम कारिडोर, औद्योगिक हब और शहरी विकास परियोजनाओं का काम चल रहा है या फिर उनको अंतिम रूप दिया जा रहा है। ऐसे में इस सेक्टर में नौकरी का स्थायित्व सॉफ्टवेयर उद्योग के मुकाबले कई गुना ज्यादा है।

 

अंकिता नाथ कहती हैं, "देश में आधारभूत परियोजनाओं की बढ़ती संख्या और अहमियत के कारण कोर इंजीनियरिंग करियर का महत्व बढ़ रहा है। छात्रों को पता है कि इससे लंबे समय तक सिविल इंजीनियरिंग की मांग बनी रहेगी।" विशेषज्ञों का कहना है कि कई छात्र नए आईआईटी में कंप्यूटर साइंस लेने की बजाय बंबई, दिल्ली और मद्रास जैसी तीन शीर्ष पुरानी आईआईटी में सिविल इंजीनियरिंग जैसे कोर विषयों को तरजीह दे रहे हैं। 

 

डॉ सेन कहते हैं, "आईआईटी में इस साल करीब डेढ़ हजार सीटें बढ़ी हैं। इससे छात्रों के सामने करियर को ध्यान में रखते हुए अपना पसंदीदा विषय चुनने के मौके बढ़े हैं।" वह बताते हैं, "अब सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई अस्सी और नब्बे के दशक की तरह सिर्फ कांक्रीट, स्टील और कंस्ट्रक्शन साइट्स तक ही सीमित नहीं है। इसमें मशीन लर्निंग, रिमोट सेंसिंग, डेटा एनालिटिक्स, स्मार्ट मोबिलिटी और पर्यावरण-अनुकूल शहरीकरण जैसे पहलू भी शामिल हो गए हैं।"

 

शिक्षाविदों का कहना है कि इस साल आईआईटी के दाखिलों के ट्रेंड से साफ है कि कंप्यूटर साइंस अब भी छात्रों की पहली पसंद बनी हुई है। लेकिन सिविल इंजीनियरिंग जैसी ब्रांच भी अब मेधावी छात्रों को आकर्षित कर रही है। इसकी एकमात्र वजह यह है कि सॉफ्टवेयर उद्योगों में एआई के बढ़ते इस्तेमाल को ध्यान में रखते हुए छात्र अब करियर के बारे में नए नजरिए से विचार कर रहे हैं। उनका कहना है कि फिलहाल इस साल के ट्रेंड से किसी ठोस नतीजे पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। लेकिन यह मुद्दा तो सामने उभर ही रहा है कि अब देश के सबसे मेधावी छात्रों में अपने करियर व भविष्य के लोकर सोच कैसे बदल रही है।